शनिवार, 24 अप्रैल 2021

राष्ट्र कवि ! फिर जागो।

राष्ट्र कवि ! फिर जागो ।
("राष्ट्र कवि ! फिर जागो ।" का अद्यतन संशोधित संस्करण)

राष्ट्र कवि ! फिर जागो ।
जागो, कविवर जागो।
जन-जन में राष्ट्रीय चेतना,
कविवर पुनः जगाओ।।

भारत भारती विकल हो रही,
खुद की रक्षा में विफल हो रही,
कविवर ! बोलो क्यों देर हो रही ?
हिन्दी साहित्य अधीर हो रही,
जागो दिनकर ! जागो कविवर!
राष्ट्रीय चेतना को पुनः जगाओ।
राष्ट्र कवि ! फिर जागो।
रूठो मत, कविवर ! आँखें खोलो।

राष्ट्र कवि! फिर जागो।
राष्ट्र कवि! फिर जागो।
जागो, कवि वर जागो।
जागो, कवि वर जागो।

राष्ट्र कवि ! दिनकर !
कैसे मैं श्रद्धा सुमन चढ़ाऊँ ?
अश्रुपूरित आँखों से कैसे
आज तुझे हर्षाऊँ ?

भारतेंदु ने सच ही कहा, 
जो आज समझ में आई ।
भाषा संस्कृति है रुग्ण त्रस्त,
विपदा दुनिया में छाई ।।

भारतेन्दु को जब भारत की
आवाज समझ में आई ।
भारत हित में भारतेन्दु ने,
भारत से गुहार लगाई।।

"आवहुँ सब मिलि रोवहुँ भारत भाई ।
हा ! हा ! भारत दुर्दशा देखि न जाई।। "
"आवहुुँ सब मिलि रोवहुँ भारत भाई ।
हा ! हा ! भारत दुर्दशा देखि न जाई।। "

युग द्रष्टा भारतेंदु नहीं थे
केवल कविता प्रेमी ।
हिन्दी-हिन्दुस्थान भारत के
थे अन्तरतम से सेवी ।।

सत्ता है मदमस्त, स्वार्थ में
लीन विपक्षी गण हैं।
दोषी निर्दोषी दोनों मानो
एक भाव जैसे हैं।

राजनीति व्याध साहित्यिक
छल बल से भरे हुए हैं ।
स्वार्थी, अपराधी, आराजक
तत्वों से हम घिरे हुए हैं ।।

अवसरवादी और शरणागत 
माथे पर चढ़े हुए हैं ।
मानवता है त्रसित हो रही,
आतंकित समस्त धरती है ।।

धर्म-कर्म हो रहे तिरोहित,
दुष्ट भाव फैला है ।
देश द्रोहियों का भारत में
महाजाल फैला है ।।

विश्व गुरु भारत की कुटिया,
लूट रहे जग वाले ।
पोथी-पतरा सभी ले गए,
जो बचा जला वे डाले ।।

तप, कर्म, संकल्प, साधना,
ईश बल बचा हुआ है ।
गीता का उपदेश कृष्ण का,
अब भी गूँज रहा है ।।

अर्धनारीश्वर रुप हमारा,
इसे तोड़ते जो हैं ।
प्रकृति-पुरुष की दिव्य शक्ति
को नहीं जानते वे है ?

एक सनातन धर्म हमारा,
सब जीवों की सेवा है ।
दया धर्म का मूल हमारा,
क्षणभर मेरा तेरा है ।।

हम अगुण सगुण को भजते,
सबको अपना ही समझते हैं ।
वे दया धर्म से पतित, हमें
कायर काफिर तक कहते हैं ।।

हम शान्ति, न्याय, आदर्श, अहिंसा,
सत् पथ पर चलते हैं ।
वे ज्योति बुझा कर हमें कुमार्ग
पथ पर चलने को कहते हैं ।।

तोड़ रहे सांस्कृतिक एकता,
आपस में हमें लड़ाकर ।
पूर्वाग्रह ग्रसित प्रतिशोध की
ज्वाला को भड़का कर ।।

जाति-धर्म की राजनीति
हरदम करते रहते हैं ।
ऊँच-नीच का पाठ पढ़ा कर
ये हमको ठगते हैं ।।

भटक रहे जो खुद भ्रमित हो,
औरों को राह दिखाते हैं ।
नद निर्झर की धारा को वे
शिखरों की ओर बहाते हैं ।।

आर्ष ज्ञान से भटका कर
पाश्चात्य जगत ले जाते हैं ।
आधुनिक विज्ञान ज्ञान से,
वे हमको भरमाते हैं ।।

" सोने की चिड़ियाँ " का
अद्भुत रुप नहीं देखा है ।
वरदा भारत भारती माँ से
वेकार उलझ बैठा है ।।

रण चण्डी को बुला रहा है,
रोज निमन्त्रण देकर ।
भगवा धारी प्रकट हुई हैं,
आज तिरंगा लेकर ।।

राष्ट्रकवि ! इनके वन्दन का,
समय पुनः आया है ।
जागें बन मुचुकुन्द कविवर,
राक्षसी प्रवृत्ति छाया हैं ।।

भस्म करें निज ज्ञान नेत्र से,
अन्तर के असुर दलों को ।
अमृत का उपहार सुरों को,
दें फिर मोहिनी बन के ।।

काल कूट तू ही पी सकते,
औरों में शौर्य कहाँ है ?
रहते शांत, असीम धैर्य की
शक्ति यहाँ कहाँ है ?

कविवर ! उठो,जगो हे दिनकर !
तम को दूर भगाओ ।
श्रम जीवी, बुद्धि जीवी को,
सत् पथ राह दिखाओ ।।

बाट जोहती खड़ी भारती
कब से हिन्द जन मन में ।
देर हो रही रणचंडी के,
पावन अभिनन्दन में ।।

" हिन्द उन्नायक " खोज रही हैं,
कब से भारत माता ।
रचनात्मकता का वरण करो,
अवसर न हरदम आता ।।

अपने और पराये अर्जुन,
इन्हें अभी पहचानो ।
अन्तस्थल के विराट को,
दिव्य-दृष्टि से जानो ।।

माता रही पुकार राष्ट्रकवि !
जागो और जगाओ ।
भूषण, गुप्त, सुभद्रा, प्रसाद को
फिर से आज जगाओ ।।

विखरे अपने अंगों को
आज पुनः अपनाओ ।
सत्तर वर्षों की निद्रा से,
वीरों को पुनः जगाओ ।।

भारत की सभ्यता-संस्कृतिक,
संकट में पड़ी हुई है ।
रक्त बीज, जय चन्द, शकुनि से
धरती भरी हुई है ।।

अर्जुन को ही नहीं युधिष्ठिर को
भी रण में लड़ना होगा ।
पाने को अधिकार विवेक से
कर्त्तव्य पूर्ण करना होगा ।।

रण में जो आड़े आयेंगें,
उनको हम सबक सिखायेंगे ।
हम विदुर और चाणक्य सूत्र से
सारे जग को हम जीतेगे ।।

"शैलज" मिथिला की सीमा पर
" दिनकर " की सिमरिया नगरी है ।
हिन्दी साहित्य भाषा शैली की
अवशेष अशेष यह गगरी है ।।

इस पुण्य भूमि को नमस्कार
जिसने तुम-सा सुत जन्म दिया ।
भारत माता की सेवा में निष्ठा से
जीवन भर अपना कर्म किया ।।

देव- दनुज हेतु जहाँ अमृत प्रकटे,
प्राकृत संस्कृत वेद वचन प्रभु से निकले ।
रुप मोहिनी, हरि, राम, विष्णु आये,
सुरसरि हित अवतरित हुए प्रभु रुक पाये ।।

कविवर जागो ! हे राष्ट्र कवि !
दिनकर ! तू आँखें खोलो ।
गोपद 'रेणु' लो, "मैला आँचल" ।
शुचि गंगा जल से धोलो।।

प्रगतिशील रचनात्मक पथ पर,
चलने का व्रत ले लो ।
जीव जगत मानव के हित में,
दृढता से संकट को झेलो।।

आधुनिक प्राचीन मतों में
अन्तर है, पुनः विचारो।
किसी मोहवश लेकिन,
सच को न कभी दुत्कारो।।

जन्म लिया जिस नारी से,
माँ कहलाती है जग में।
मातृभूमि को माँ कहने में, 
क्या दुविधा अन्तस् में।

ममतामयी माँ भारत माता,
निज माँ सा आँचल में खेलो।
पूर्वाग्रह सब त्याग सुपथ संग,
चलने का व्रत कवि ले लो।।

हे राष्ट्रकवि ! दिनकर ! कवि वर !
जन गण मन बोल रहा है ।
भारत माता का दिल संतति संग,
दिनकर रट बोल रहा है।।

हे राष्ट्र कवि! दिनकर !
कैसे मैं श्रद्धा सुमन चढ़ाऊँ ?
अश्रुपूरित नेत्रों से कैसे,
कवि ! मैं आज तुझे हर्षाऊँ ?

राष्ट्र धर्म हो नहीं कलंकित
ऐसा राष्ट्र बनाऊँ ।
सत्य सनातन धर्म कर्म का,
जग को पाठ पढ़ाऊँ ।।

भारत माता की सेवा में
जीवन शेष बिताऊँ ।
जनता की सच्ची सेवा कर
जन सेवक कहलाऊँ ।।

मांग रहा बलिदान राष्ट्र जब
कभी नहीं घबराऊँ ।
ज्ञान- विज्ञान, कला , अध्यात्म
का जग को पाठ पढ़ाऊँ ।।

अहंकार में भटके जन को
कैसे राह दिखाऊँ ?
पीड़ित मन से कैसे कविवर,
आज तुझे हर्षाऊँ ?

राष्ट्रराष्ट्र कवि ! हृदय की पीड़ा,
कैसे तुम्हें बताऊँ ?
राष्ट्र कवि ! दिनकर !
कैसे मैं श्रद्धा सुमन चढाऊँ ?

प्रो० अवधेश कुमार " शैलज "‛
पचम्बा, बेगूसराय ।
मॊवाईल न०ः ८२१०९३८३८९

सोमवार, 12 अप्रैल 2021

माँ दुर्गा की प्रार्थना


अपनी बोली अर्थात् अंगिका क्षेत्र बेगूसराय की भाषा में माँ दुर्गा की वन्दना / प्रार्थना करने का मैंने आज प्रथम बार प्रयास किया है और मिथिला क्षेत्र होने के कारण इस प्रार्थना में मिथिला की भाषा शैली का भी समावेश हो गया है। अतः विद्वत् जन कृपया अन्यथा भाव न लेकर उत्साहवर्धन करेंगे तथा सम्यक् मार्ग दर्शन करेंगे। शुभमस्तु।।

माँ दुर्गा की प्रार्थना (संशोधित)

हे दुर्गा दुर्गति नाशिनी मैया !
कण-कण में तू वासिनी मैया!
किये हमरा भटकावै छे ?
किये न दै छे सुन्दर मति माँ,
किये न ज्ञान बढ़ावै छे ?
हे दुर्गा दुर्मति नाशिनी माँ !
हमरा किये रुलावै छे ?
करम-धरम हम बूझै नै छौं ,
हमरा किये नै सिखावै छे ?
माई-बाप के कैसन बेटा ?
लोग से बात सुनाबै छे ?
होवे छे अपमान तोहर जब,
जीवन ई व्यर्थ सुनाबै छौं ।
हे दुर्गा दुर्भाग्य नाशिनी !
माँ! ममता किये न दिखावै छे ?
कर्म सुकर्म के समझ नै हमरा,
पूजा पाठ न आवै छै ।
जनम देले, भेजले धरती पर।
की करुँ ? सदा पछतावै छौं ।
कुछ न चलैय हमरा ई जग में,
सत् पथ में संकट पावै छौं ।
कोई न साथी संगी जग में,
सबके स्वारथ में पावै छौं ।
गलत करम के राही छै सब,
हमरो हरदम भटकावै छै।
जौं नै चलैय छौं ओकर राह पर,
हमरा रोज सतावै छै।
हे दुर्गा ! हे शिवे! त्र्यम्बिके!
जग जननी! तू कहलवै छे।
सृष्टि पालनहार जगत के,
तू ही में जगत समावै छै।
कर्म , आयुु, सौभाग्य,  ज्ञानदा।
जोग जुगुति नैय जानय छौं ।
अन्तर्यामिनी! सिद्धि दात्री!
दिल के बात बतावै छौं ।
अवगुण अहंकार दुर्गुण के
पार न हम सब पावै छौं ।
कृपा करू हे माँ अघ नाशिनी!
शैलज पुत्र पुकारै छौं ।
क्षमा करू हे अम्मा अम्बे !
निज मातृभाषा में बाजै छौं ।

सब सन्तान तोरे छै मैया,
किये न उनका समझावै छे ?
जौं ई बात गलत छै मैया।
किये वेद पुराण पढ़ावै छे ।

त्रिविध ताप नाशिनी मैया,

सत्पथ तू दर्शावै छे।

ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सेवक, सबके,

मैया तू लाज बचावै छे ।

हे दुर्गा दुर्गति नाशिनी!
शरणागत दर्द सुनाबै छौं ।
चरण शरण दियौ हे मईया,
सब जग में तोहें पावै छौं ।
तू दुर्भाग्य नसावै छी माँ!
तू सौभाग्य जगावै छी माँ!
हे दुर्गा दुर्गति नाशिनी माँ!
......
हे दुर्गा दुर्गति नाशिनी माँ!
क्षमा करू सब भूल चूक माँ!
वरदायिनी! शब्द न पावै छौं ।
"ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै।"
कोशिश कर जाप सुनाबै छौं।
करके स्मरण सिद्ध कुञ्जिका
निज अन्तर्भाव बतावै छौं।
हे दुर्गा दुर्गति नाशिनी माँ!
जे बुझावै छै से गावै छौं।
हे दुर्गा............।

अवधेश कुमार शैलज, पचम्बा, बेगूसराय।


बुधवार, 7 अप्रैल 2021

शैलज घायल हो गया.....

शैलज घायल हो गया, चुभ गया दिल में तीर।
मुरझाया आनन कमल, बदल गया तकदीर।।

मौसम बदला, हवा चली, बुझ गया एक चिराग।
नीतिवान् गाते सदा, परिवर्त्तन राग विराग।।

बंद झोपड़ी में पड़ा, कब से राज कुमार।
आज उजागर हो गया, उसका सब व्यापार।।

जनता बैठी द्वार पर, करती आर्त्त पुकार।
नेता सेवक मदमस्त हैं, लगा राज दरबार।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज,
(कवि जी),
पचम्बा, बेगूसराय।

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

सरस्वती वंदना

सरस्वती वंदना:

ऐंकारी सृष्टि कारिणी, शारदा ज्ञान बुद्धि प्रदायिनी।
वीणा पाणि, हंस वाहिनी, नीर क्षीर गुण न्याय कारिणी।

वीणावादिनी, विद्या दात्री, सर्व सौभाग्य प्रदायिनी।
सरस्वती शुभदा सौम्या, जगदीश्वरी वरदायिनी।

ऊँकारेश्वरी त्र्यम्बिके माता, त्रिविध ताप विनाशिनी।
श्वेत पद्मासना, श्वेत वसना, आरोग्य आयु सुखदायिनी।

ऋद्घिसिद्घिप्रदा, निधिदा, नित्या, यन्त्र मन्त्र तन्त्रेश्वरी।
ज्योतिप्रदा, धनदा, यशदा, सुरेश्वरी, जगदीश्वरी।

जड़ शैलज बोधदा, प्रज्ञा, अज्ञान,अधम, तम नाशिनी।
स्रष्टा, पालक, समाहर्ता, भुक्ति मुक्ति बोध प्रदायिनी।

सर्वं त्वेष त्वदीयं माँ, नमस्तुभ्यं भारती।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, पचम्बा, बेगूसराय।


सोमवार, 4 जनवरी 2021

हम किसान छी

हम किसान छी राजनीति के, सूखा कहीं बाढ़ भो भेल।
की करूँ खेती, की करूँ मेल ? बाबा पप्पू कहाँ चलि गेल ?

खाद बीज सब महँगा भेल, बिजली पानी डीजल गेल।
नेता अफसर भेंट भो गेल, बाबा पप्पू कहाँ चलि गेल ?

राहु केतु के चक्कर भेल, की कहुँ नींद हमर उड़ि गेल।
मजदूरी कत महँगा भेल ? बाबा पप्पू कहाँ चलि गेल ?

बाढ़ल मजदूरी महँगाई भेल, मजदूर अवसरवादी भेल।
विधि विपरीत प्रकृति भेल, बाबा पप्पू कहाँ चलि गेल ?

नारद जलद मन मयूर न भावे, सुजन समाज मूक भो गेल।
सोच फिकर से देह गलि गेल, बाबा पप्पू कहाँ चलि गेल ?

श्रमिक किसान भिखारी भेल, जमाखोर व्यापारी भेल।
शैलज नेतागण खेले खेल, बाबा पप्पू कहाँ चलि गेल ?

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, पचम्बा, बेगूसराय।

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

शैलज दोहावली : भाग-४ (दोहा संख्या १४५ से १९२ तक का संग्रह सम्प्रति प्रकाशन की प्रक्रिया में है।)

तन सुन्दर, मन मैल संग, 
रूपसी अहम् विकार।
शैलज शील सुलक्षणा,
प्रियंवदा सुखदा संसार।।१४५।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज,
पचम्बा,बेगूसराय।

शैलज मजदूर किसान हैं,
मौसम से अनजान।
भू सेवक भूखे मरे,
नारद नेता देते दिक्ज्ञान।।१४६।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

शैलज सुमन समाज में,
अंकित करे विचार।
पुष्पाकाँछा शुभद सदा,
उत्तम मृदु व्यवहार।।१४७।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय। 

वेनीपुरी की जादू कलम,
चित्रण राज समाज।
शैलज हृदय निवास करे,
हिन्दी साहित्य श्री राज।।१४८।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

 शैलज आत्म अनुशासन बिना,
सब उपलब्धि ज्ञान बेकार।
मुक्ति बोध, जग धरम करम,
अर्थ, आदर्श काम व्यवहार।।१४९।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

सुमति सुकर्म आदर्श सुहाई।
शैलज रीति नीति अपनाई।।
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई।
दया धर्म बिनु को जग भाई ?।।१५०।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

परिणय, मंगल दिवस का, 
गीत सुमंगल गान।
गाली साली शुभद् सुखद, 
शैलज सुहृद सुजान।।१५१।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

शैलज सुध बुध खो दिया, 
राज श्री संग सुख पाय।
सुदिन सौभाग्य सुकर्म बिनु, 
जग में को जन पाय ?।।१५२।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

 राज श्री सुख वर्धिनी, 
अहम् रहित शुभ भाव।
शुभदा सौम्या जय प्रदा, 
शैलज सरल सुभाव।।१५३।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

शैलज अपने गाँव में, 
कोई न पूछनहार ।
आये शहर विदेश से, 
धनी गुणी सरदार ।।१५४।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय ।

मधुमय पूनम चाँदनी, 
नन्दन चन्दन वन माहिं।
सत्यम् शिवम् सुन्दरम् कृपा,
शैलज मोद बढ़ाहिं।।१५५।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

शैलज भनत विश्वास हरि,
विश्वास करें विश्वास।
युग-युग पायें हरि कृपा,
युगल कुमार विश्वास।।१५६।।

पावन परिणय बन्धन में,
जो प्राणी बँध जाते हैं ।
संसार सुखों से भरकर,
मंगलमय हो जाते हैं ।।१५७।।

ऋषि-मुनि मोक्ष के सुख में,
अपने को खोते हैं ।
दम्पती परिणय में ही तो,
सम्पूर्ण मोक्ष पाते हैं।।१५८।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज,
पचम्बा, बेगूसराय।

 सकल चराचर व्याप्त प्रभु, 
समदर्शी जगत आधार।
विधि हरि हर शैलज भजे, 
निज मति कुमति विसारि।।१५९।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय। 

 राज, श्री, सुखदा, शुभा; 
प्रियंवदा, प्रिया, अनमोल। 
कुलवर्धिनी, सहधर्मिणी; 
शैलज निज मति तोल।।१६०।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

 कंचन कामिनी चंचला, 
तजे आलसी उदास।
प्रेम करम हठ वश रहे, 
स्वामी शैलज दास।।१६१।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

 तन भव सागर में रहे, 
मन क्षीरोदधि पास।
शैलज तरणी सुकरम, 
हरि शरण में बास।।१६२।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।   

शैलज प्रेमी जगत का, 
अभिव्यक्ति सहज वेवाक।
सुजन सुहृद संगत करे, 
शेष समाज मजाक।।१६३।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

सृष्टि कामना हेतु नर, 
करत शुभाशुभ कर्म।
नारी आकाँक्षा रहित, 
शैलज समाज नहीं धर्म।।१६४।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

शैलज किस धन के लिए, 
झगड़ रहे नित आप ?
रूप अहं गुण जायेगा, 
कर्म धर्म पुण्य संग पाप।।१६५।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

नारी प्रकृति नारायणी, 
हरि नर पुरुष स्वरुप। 
अर्द्ध नारीश्वर शिव शक्तिदा, 
शैलज प्रेम प्रतिरूप।।१६६।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

शैलज अवगुण से भरा,
गुण समाज के पास।
भोगी मन,आत्मा अमर,
निर्णायक रमानिवास।।१६७।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

शब्द रुप रस गुण कर्म रहित मैं, 
तू भावाभिव्यक्ति काव्य सहारे।
शैलज प्रस्तर, सुमन मदार मैं, 
आयुष राज श्री दाता शिव प्यारे।।१६८।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

अलि प्रिय भ्रमर सुमन रस,
मधु संचय प्रकृति सुभाव।
शैलज षडरस स्नेह युत,
मधुमय शुभ सुखद प्रभाव।।१६९।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
(कवि जी)
पचम्बा, बेगूसराय।

अलि प्रिय भ्रमर सुमन रस,
मधु संचय प्रकृति सुभाव।
शैलज षड् रस स्नेह युत,
मधुमय शुभ सुखद प्रभाव।।१७०।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

सपरिवार आपको तथा समस्त परिजन -पुरजन के दीर्घायुष्य और सर्वांगीण विकास हेतु ईश्वर से प्रार्थना के साथ ही ईसाई नववर्ष 2021 की हार्दिक शुभकामना।

धन बल जन पद मद भरा, 
आपु जीव नर चाल।
चढ़े गिरे अविवेकी कुटिल, 
शैलज अधम मिशाल।।१७१।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

योग विवेक परहित सुकृति,
दया धर्म शुचि दान।
सुमन गृहस्थ, सुदेह सुख,
शैलज प्रभु पथ ज्ञान।।१७२।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

शैलज गदहा श्वान सिंह,
गीदड़ काक वृष जान।
सेवत गुरुवत् जीव प्रकृति,
शत्रु मित्र समान।।१७३।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

शैलज शुक पिक हंस अलि,
गोपद हरि हिय ध्यान।
सेवत गुरुजन जीव प्रकृति,
देश काल पहचान।।१७४।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

शैलज पर दु:ख दु:खी जो,
सुर नर मुनि महान्।
दया रहित स्वार्थी मनुज,
अधर्मी दनुज समान।।१७५।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

साक्षी आत्मा, वकील मन,
सच माया जग जीव संघर्ष।
शैलज न्यायाधीश हरि,
प्रकृति पुरुष विधि विमर्श।।१७६।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

तर्जनी वात, पित्त मध्यमा, 
अनामिका कफ प्रकृति आधार।
शैलज नाड़ी ज्ञान शुभ , 
दक्षिण वाम नर नारी अनुसार।।१७७।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

तीतर, लावा, बटेर गति, 
नाड़ी त्रिदोष गति चाल।
अहि गति मेढ़क हंस शुभद्, 
हंस मध्य कुचाल।।१७८।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

हंस मन्द गति कफ प्रकृति,
काम कबूतर मोर।
मेढ़क कौवा अति तीव्र गति,
पित्त क्रोध घनघोर।।१७९।।

वात जोंक अहि कुटिल गति,
लोभ मोह सन्ताप।
शैलज नाड़ी गति जानिये,
आयु वैद्य प्रभु आप।।१८०।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

 शैलज कुमति शिकार जो,
बाल, वृद्ध युवा नर-नारि।
देश, काल औ विधि विमुख,
दु:ख पावत जीव अपार।।१८१।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

शैलज तू क्या कर रहा,
आकर जग में नित काज ?
समय चूक पछतायेगा,
सत् धर्म कर्म का राज।।१८२।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

दैनान्दिनी शुभदायिनी,
अनुपमा  सुखधाम।
शैलज राज श्री वर्धिनी,
अभिव्यक्ति गुण ग्राम।।१८३।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

रवि सुत शनि गृह आगमन,
शुभ मुहूर्त, सुख मूल।
शैलज मकर त्रिदोष हर,
नव ग्रह जनित त्रिशूल।।१८४।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

शीश रेणु गोपद धरत,
कान्हा ब्रज गोधूलि प्रात।
शैलज रेणु गोपाल पद,
भव तारक हरि तात।।१८५।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

नीर प्रवाह नीरज नयन,
श्याम प्रेम पिय मोर।
शैलज भींगत स्नेह रस,
राज, श्री, सुख चहुँ ओर।।१८६।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

शैलज कन्या शक्तिदा, 
प्रकृति पुरुष हिय हार।
नैहर की जंगल अलि!
पिय गृह वंदनवार।।१८७।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

केसरिया संस्कृति सनातन, 
कीर्ति, शौर्य, बल दायक।
सादा सादगी, सच्चाई, आदर्श, 
न्याय, बुद्धि, शुभ कारक।।
हरा भारत भूमि माता श्री, 
ज्ञान, विज्ञान, विकास का सूचक।
अनवरत प्रगति चक्र, 
तिरंगा भारत वर्ष का द्योतक।।१८८।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय। 

अनिल पतंग विचरे नभ,
भोग योग सुख साथ।
कटी पतंग सुमिरन करे,
शैलज हरि जग नाथ।।१८९।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

शैलज अहं विकार गुण,
सद् गुण गुण हरि लेत।
हरि प्रभु आँकलन करत,
अपयश जग में लेत।।१९०।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

निज हित शैलज कर रहा,
जग में नित हर काज।
आया जग में फिर जायेगा,
विधि धर्म कर्म सुख राज।।१९१।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

भव सागर जग बन्धु प्रकृति,
प्रिय सखा शत्रु व्यवहार।
धर्म कर्म विधि संगति फलद्,
शैलज विश्वास विचार।।१९२।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।

 
पद मद अहं सौन्दर्य बल,
निज देह ज्ञान बल यार।
कोटि जतन संग जात नहीं,
शैलज राज श्री सुख सार।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, 
पचम्बा, बेगूसराय।




शनिवार, 21 नवंबर 2020

भोली भाली प्रिया सौम्या

भोली-भाली प्रिया सौम्या , 
जीवन की हरियाली है।
राज-श्री, शुभदा, सुखदा; 
सौभाग्य बढ़ाने वाली है।।

नयनों की काजल हितकारी, 
राधा श्याम दुलारी है।  
नर मुनि सुरासुर पूज्या, 
रमणी कन्या सुखकारी है।।

हृदवासिनी धनदा गृहिणी, 
कामिनी जया कल्याणी है।
प्रेयसी प्रिया पावन दिव्या, 
अबला प्रबला महारानी है।।

दारा, तनुजा, भगिनी, देवी, 
बधू, कन्या रुप अनेकों नारी हैं।
विटप वल्लरी पुष्पलता प्रिया, 
हिय हार प्रियम्वदा प्यारी हैं।।

धारिणी पुंबीज सन्त्तति दाता, 
मातृत्व वात्सल्य प्रदायिनी है।।
दिव्यांगना शैलज हितकारी, 
सुर सरि गंगा सम पाविनी है। 

भोली-भाली प्रिया सौम्या, 
जीवन की हरियाली है।
राज श्री शुभदा सुखदा, 
सौभाग्य बढ़ाने वाली है।।

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज,
पचम्बा, बेगूसराय, बिहार, भारत।

    
 
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