मैंने अधोलिखित चिकित्सा सूक्त- 1 से 21 तक की रचना की जो किसी भी चिकित्सा पद्धति के चिकित्सक, विद्यार्थी, रोगी, परिचारक एवं विद्वानों हेतु महत्वपूर्ण एवं उपयोगी है :-
चिकित्सा सूक्त-1.
किसी भी चिकित्सा पद्धति में और मुख्यतः होमियोपैथिक, बायोकेमिक तथा मनोवैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति में रोगी केन्द्रित चिकित्सा ही निर्दोष आरोग्य प्रदान करती है, क्योंकि रोगी केन्द्रित चिकित्सा पद्धति के द्वारा चिकित्सक रोगी के सम्पूर्ण व्यक्तित्व एवं कृतित्व का "सम्यक् मुक्त साहचर्य विधि" से अध्ययन करता है और उसके वातावरण में उपस्थित होते आ रहे ज्ञाताज्ञात् उद्दीपनों / परिस्थितियों के प्रति उस प्राणी की अनुभूति, व्यवहार एवं समायोजन प्रक्रिया का निष्पक्ष एवं पूर्वाग्रह रहित सम्यक् अवलोकन, मूल्यांकन और मार्गदर्शन करता है तथा निर्दोष आरोग्य हेतु यथसंभव आवश्यक योगदान करता है।
चिकित्सा सूक्त-2.
किसी भी चिकित्सा पद्धति (होमियोपैथिक, बायोकेमिक या किसी अन्य चिकित्सा पद्धति) के चिकित्सक को "रोग केन्द्रित चिकित्सा पद्धति" के स्थान पर "रोगी केन्द्रित चिकित्सा पद्धति" एवं साथ ही "सम्यक् मुक्त साहचर्य प्रविधि" को अपनाना चाहिए। यह सच है कि कोई भी चिकित्सकीय परीक्षण या जाँच प्रविधि उस चिकित्सक के लिए विशेष उपयुक्त और उपयोगी होता है जिन्हें रूग्ण व्यक्ति के लाक्षणिक श्रोतों से रोगी के मनो-शारीरिक अवस्था एवं उनकी जीवनी शक्ति की समझने की न तो क्षमता रहती है और न ही वे इस महत्वपूर्ण तथ्य या सत्य को स्वीकार करने के लिए तैयार रहते हैं।
चिकित्सा सूक्त-3.
होमियोपैथिक औषधियों / दवाओं का उपयोग या प्रयोग अपने देश के अन्दर उपस्थित शत्रु खेमों पर बम वर्षा के समान है। अतः अत्यंत सावधानी से होमियोपैथिक औषधियों / दवाओं का उपयोग या प्रयोग करना चाहिए।"
मेरे इस कथन या चिन्तन का होमियोपैथी के जनक और अन्य विद्वानों के चिन्तन के साथ तुलनात्मक अध्ययन करें।
चिकित्सा सूक्त-4.
किसी व्यक्ति की अस्वस्थता का कारण प्रत्यक्षतः कुछ भी रहा हो, लेकिन उसके निर्दोष आरोग्य हेतु उसे स्वयं पहल करनी पड़ेगी, क्योंकि बीमारी का अर्थ होता है, अपने आप पर से नियन्त्रण कम हो जाना अर्थात् जीवनी शक्ति का कमजोर हो जाना, जिससे प्राणी अपने अति मूल्यांकन या अवमूल्यन का शिकार हो जाता है।
चिकित्सा सूक्त-5.
किसी प्राणी की अस्वस्थता के मूल कारणों के सम्यक् उपचार से उसकी जीवनी शक्ति की यथेष्ट सक्रियता से वह प्राणी आत्मनिर्भर होकर निर्दोष आरोग्य को प्राप्त करता है, परन्तु रोग या अस्वस्थता के प्रत्यक्ष कारणों की उपेक्षा आत्मबल की कमी का कारण बन सकता है, जो निर्दोष आरोग्य में बाधक हो सकता है।
चिकित्सा सूक्त-6.
किसी भी चिकित्सा पद्धति में ( मुख्यतः होमियोपैथिक, बायोकेमिक एवं प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति में ) प्राणी की सर्द, गर्म या समशीतोष्ण प्रकृति आधारित चिकित्सा रूग्ण प्राणी के जीवनी शक्ति के प्रवलीकरण हेतु औषधि चयन और / या आवश्यक संसाधन की उपलब्धता का सहज, सुगम एवं यथेष्ट मार्ग प्रशस्त होता है, जिससे निर्दोष आरोग्य लाभ अविलम्ब प्राप्त होता है। परन्तु प्राणी की सर्द, गर्म या समशीतोष्ण प्रकृति प्राकृतिक एवं तत्कालीन दो प्रकार की होती है, जिसका सम्यक् और सन्तुलित अध्ययन कर यथेष्ट निर्णय लेना अपेक्षित होता है।
चिकित्सा सूक्त-7.
किसी भी व्यक्ति की ज्ञानेन्द्रियों की कार्यक्षमता में कमी उसके शरीर स्थित जैविक रसायन में असन्तुलन से उत्पन्न अस्वाभाविक स्नायु प्रवाह और / या गतिरोध और / व्यतिक्रम उसके मस्तिष्क को प्राप्त होने वाले स्नायु प्रवाह तरंगों के व्यतिक्रम के प्रति सम्वेदनशीलता से प्रभावित होता है, परिणामस्वरूप उस प्राणी के वातावरण में उपस्थित उद्दीपनों का स्पष्ट और / या विशिष्ट संकेत बोध के अभाव में उक्त उद्दीपनों की यथार्थ सम्वेदना नहीं हो पाता है, जिससे वास्तविक प्रत्यक्षण बाधित होता है, फलस्वरूप उसके मस्तिष्क द्वारा लिया गया निर्णयों में निर्दोषता में कमी आ जाती है और मस्तिष्क द्वारा प्राणी के मनो-शारीरिक स्थिति में उद्दीपनों के प्रति यथेष्ट सक्रियता और/या यथार्थ अनुक्रिया संकेत के अभाव में प्राणी की उद्दीपनों के प्रति अनुक्रिया (समायोजन एवं व्यवहार) में व्यतिक्रम दृष्टिगोचर या अनुभव होता है।
चिकित्सा सूक्त-8.
किसी भी प्राणी का अपने वातावरण के उद्दीपनों की अनुभूति एवं अनुक्रिया (समायोजन तथा व्यवहार) के क्रम में उसके मानसिक, दैहिक और / या मनोदैहिक स्थितियों से सम्बन्धित कोई ऐसा सूक्ष्म या स्थूल प्रभाव जो उस प्राणी की जीवनी शक्ति की निरन्तरता एवं प्रबलता को बाधित करता हो, उसके अपनी या अवलोकन कर्त्ता की दृष्टि में उसे सामान्य से भिन्न अवस्था में महसूस और / या प्रमाणित करता हो, उक्त स्थिति के सन्दर्भ में उस प्राणी हेतु असामान्य और / या रूग्ण की संज्ञा का उपयोग या प्रयोग किया जाता है, जिसकी सजीव अवस्था में निर्वाध समायोजन को निर्दोष आरोग्य की संज्ञा दी जाती है।
चिकित्सा सूक्त-9.
निर्दोष आरोग्य एक सतत् आरोग्य प्रक्रिया है जो प्राणी के वातावरण में उपस्थित उद्दीपनों की अनुभूति एवं अनुक्रिया (समायोजन एवं व्यवहार) प्रक्रिया के क्रम में प्राणी की जीवनी शक्ति की नकारात्मक धारा को सकारात्मक दिशा प्रदान करता है तथा उसकी आत्मघाती प्रवृत्ति को दूर कर उसे विशिष्ट रूप से आत्म-प्रतिष्ठित, लक्ष्योन्मुख, धैर्य सम्पन्न, प्रतियोगी एवं संघर्ष शील बनाता है।
चिकित्सा सूक्त-10.
किसी प्राणी के वातावरण में उपस्थित उद्दीपनों के प्रति उसकी अनुक्रिया (समायोजन एवं व्यवहार) के क्रम में उत्पन्न मानसिक, दैहिक या मनोदैहिक विसंगतियों के परिणामस्वरूप किसी स्थूल या सूक्ष्म पीड़ित अंगों से सम्बन्धित सद्यः उत्पन्न या तीव्र प्रभाव और / या शनैः शनैः विकसित या जीर्ण प्रभाव से आन्दोलित तथा क्षीण होती जा रही जीवनी शक्ति के पुनर्गठन हेतु आवश्यक प्राकृतिक एवं चयापचय अनुकूल संसाधनों, खनिज एवं जैव रासायनिक तत्वों के स्थूल या सूक्ष्म शक्तियों के सम्यक् तथा विधि सम्मत उपादान को औषधि कहते हैं।
Dr.Prof.Awadhesh kumar Shailaj(AI मानद उपाधि: विज्ञान, मनोविज्ञान, चिकित्सा, दर्शन एवं समग्र अध्ययन)
मंगलवार, 6 जनवरी 2026
चिकित्सा सूक्त- 12 का अद्यतन संशोधित संस्करण :-
चिकित्सा सूक्त- 12
"किसी भी चिकित्सा पद्धति में रोगी को केवल तत्कालिक लाभ या राहत या आराम पहुँचाना आपका (चिकित्सक का) ध्येय या उद्देश्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि उससे बाद में हानि भी संभव है।"
इस सूक्त का अधोलिखित संशोधित संस्करण रूप रुग्ण प्राणी, चिकित्सकों, चिकित्सा शास्त्र के विद्यार्थियों, पाठकों एवं विद्वानों के हित में प्रस्तुत किया जा रहा है :-
चिकित्सा सूक्त- 12:-
"किसी भी चिकित्सा पद्धति में रोगी को केवल तत्कालिक लाभ या राहत या आराम पहुँचाना किसी चिकित्सक का ध्येय या उद्देश्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि उससे बाद में हानि भी संभव है।"
डॉ० प्रो० अवधेश कुुमार शैलज,
एम.ए.: मनोविज्ञान, विधि-छात्र, ज्योतिष-प्रेमी, रचनात्मक विचारक, होम्योपैथिक, बायोकेमिक एवं समग्र चिकित्सा विद्।
(AI मानद उपाधि: विज्ञान, मनोविज्ञान, चिकित्सा, दर्शन एवं समग्र अध्ययन)
पिता: स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद सिंह
गाँव: पचम्बा, जिला: बेगूसराय,
पिनकोड: 851218, राज्य: बिहार (भारत)।
चिकित्सा सूक्त- 13:-
चिकित्सा सूक्त- 14:-
किसी भी व्यक्ति को यह बोध होना चाहिए कि जब एक बून्द या अल्पतम मात्रा में बिष के सेवन या प्रयोग से किसी भी प्राणी की जीवन लीला समाप्त हो जाती है या समाप्त हो सकती है, तो प्राणी को एक बूंद दवा अर्थात् औषधि उसे सुरक्षित रख सकती है और जीवन दान दे सकती है।
चिकित्सा सूक्त- 15:-
किसी भी चिकित्सा पद्धति में चिकित्सक को प्राणी अर्थात् रोगी के रस, रक्त, धातु, अवस्था एवं स्थिति का ध्यान रखते हुए चिकित्सा करनी चाहिए।
चिकित्सा सूक्त- 16 :-
"रात्रि का प्राकृतिक उद्देश्य प्राणी को निद्रा (Rest) प्रदान करना है ताकि प्राणी को उषाकाल में जगते ही या जागृत अवस्था में भगवान् भास्कर की दिव्य नव जीवन रश्मि की प्राप्ति और दर्शन नव चेतना के साथ हो सके और वह दीर्घायुष को प्राप्त कर आत्म कल्याण, लोक कल्याण, प्राकृतिक हित एवं परमात्मा की सेवा कर सके एवं उनके आदेश का पालन कर सके - चाहे वह रोगी हो या वैद्य हो।"
अर्थात्
"रात्रि का उद्देश्य प्राणी को विश्रांति प्रदान करना है, जिससे वह प्रभात में भगवान् भास्कर की नवजीवनदायिनी किरणों से नवचेतना प्राप्त कर, दीर्घायु होकर आत्मकल्याण, लोकहित, प्राकृतिक समरसता एवं ईश्वर सेवा में प्रवृत्त हो सके। अतः रोगी हो या वैद्य, सभी को रात्रि का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।"
चिकित्सा सूक्त- 17 :-
होमियोपैथिक एवं बायोकेमिक दोनों चिकित्सा पद्धतियों में सर्वांगीण लक्षणों का मूल उन दोनों पद्धतियों के औषधियों के मानसिक, चारित्रिक, अकाट्य एवं समवर्ती लक्षणों में पाये जाते हैं और कुल मिलाकर इन मौलिक लक्षणों का उनके मानसिक लक्षणों के साथ अकाट्य सम्बन्ध होता है, अतः अन्य चिकित्सा पद्धतियों में जहाँ प्राणी को रोगी अर्थात् आश्रित प्राणी माना जाता है जो एलोपैथी के अनुसार विषाणु या जीवाणु के सम्पर्क या आक्रमण से पीड़ित हैं या विषाक्तता से प्रभावित हैं और इनके प्रभाव से उत्पन्न संकट को दूर करने हेतु इनके रोग उत्पादक कारण की खोज या जाँच कर उनकी चिकित्सा की जाय और आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में भी रूग्ण प्राणी के रोग कारण की कफ, पित्त एवं वात आधारित जाँच प्रविधियों के सहारे प्राणी की चिकित्सा होती है, जिसमें प्रायः रोग के कारणों को समझने में चिकित्सक को एक ओर पर्याप्त समय, श्रम एवं संसाधन की आवश्यकता होती है तथा इनकी दवायें प्रायः रोग के सूक्ष्म कारणों को दूर करने में पूर्णतः सक्षम नहीं होते हैं, लेकिन होमियोपैथिक एवं बायोकेमिक औषधियों के मानसिक, चारित्रिक, अकाट्य एवं समवर्ती लक्षणों में से किसी एक या एकाधिक लक्षणों की रोग लक्षण से साम्यता होते ही दवायें औषधि कहलाने का अधिकारी हो जाती हैं और औषधि उस प्राणी के संवेदनशील ज्ञानेन्द्रियाँ जिह्वा या विशेष परिस्थिति में नाक के माध्यम से उपलब्ध कराने से प्रायः प्राणी की जीवनी शक्ति सद्यः जग जाती है, उसकी शिथिलता दूर हो जाती है, उसे अपनी प्रबलता का बोध हो जाता है और उसके सुसंचालित होते ही रोग का अस्तित्व समाप्त हो जाता है या समाप्त होने की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है।
चिकित्सा सूक्त- 18 :-
किसी भी चिकित्सा पद्धति में प्राणी अर्थात् रोगी के आत्मीय जन, परिवार के सदस्य अथवा किसी अन्य सहयोगी व्यक्ति का कर्त्तव्य है रोगी को चिकित्सा के क्रम चिकित्सक तक ले जाने या आवश्यक मदद करना और चिकित्सक द्वारा आवश्यकता महसूस किया जाने पर मदद करना, चिकित्सा के क्रम में अनावश्यक हस्तक्षेप किसी भी परिचारक द्वारा रोगी हेतु "रक्षा में हत्या" के समान ही होगा।
चिकित्सा सूक्त- 19:-
किसी भी चिकित्सा पद्धति में रोग लक्षण संग्रह में रोगी, परिचारक और / या चिकित्सक किसी भी तरह पूर्वाग्रह या पक्षपात् का सहारा न लें।
रोगी यथा संभव अपने रोग लक्षणों घटा या बढ़ा कर वर्णन न करें,बल्कि उसके साथ जो कुछ घटित हो चुका है या हो रहा है, उसका हू-ब-हू वर्णन करे तथा परिचारक या चिकित्सक उसके लिये किन्हीं लक्षण विशेष को अपनी ओर लादने या अस्वीकार करने हेतु अनावश्यक दबाव डालने का प्रयास न करें।
चिकित्सा सूक्त- 20 :-
किसी भी चिकित्सा पद्धति में चिकित्सक द्वारा किसी रोगी के रोग लक्षणों को किसी दवा विशेष से मिलाने या औषधि विशेष से अलग मानने या मनाने का प्रयास करना सम्यक् चिकित्सा, यथार्थ औषधि निर्णय और निर्दोष आरोग्य प्रविधि का परिचायक नहीं हो सकता है। अतः सम्यक् चिकित्सा हेतु पक्षपात् एवं पूर्वाग्रह का त्याग अनिवार्य है।
चिकित्सा सूक्त- 21:-
किसी भी चिकित्सा पद्धति के चिकित्सक के लिये रोगी के निर्दोष आरोग्य हेतु सर्वांगीण एवं वहु आयामी लक्षण संग्रह करते हुए लक्षण समष्टि के आधार पर औषध लक्षणों का सांगोपांग एवं तुलनात्मक अध्ययन कर ठोस, संतुलित, त्वरित एवं सारगर्भित निर्णय के आधार पर औषधियों का चयन सम्यक् आरोग्य कारक होता है।
डॉ० प्रो० अवधेश कुुमार शैलज
एम.ए.: मनोविज्ञान, विधि-छात्र, ज्योतिष-प्रेमी, रचनात्मक विचारक, होम्योपैथिक, बायोकेमिक एवं समग्र चिकित्सा विद्।
(AI मानद उपाधि: विज्ञान, मनोविज्ञान, चिकित्सा, दर्शन एवं समग्र अध्ययन)
पिता: स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद सिंह
गाँव: पचम्बा, जिला: बेगूसराय,
पिनकोड: 851218, राज्य: बिहार (भारत)।
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इस संशोधित चिकित्सा सूक्त- 12 का गूगल ट्रान्सलेटर द्वारा क्रमशः अंग्रेजी भाषा एवं संस्कृत भाषा में प्रस्तुत अनुवाद अधोलिखित है :-
I have composed the following medical aphorisms (1 to 21), which are important and useful for physicians, students, patients, caregivers, and scholars of any medical system:-
Medical Aphorism-1.
In any system of medicine, and especially in homeopathic, biochemical, and psychological medicine, patient-centered treatment provides flawless healing. This is because, through the patient-centered approach, the physician studies the patient's entire personality and actions using the "method of free association," and objectively and without bias observes, evaluates, and guides the patient's perception, behavior, and adjustment process in response to known and unknown stimuli/circumstances present in their environment, thus contributing as much as possible to flawless healing.
Medical Aphorism-2.
Physicians of any system of medicine (homeopathic, biochemical, or any other) should adopt a "patient-centered approach" instead of a "disease-centered approach," along with the "method of free association." It is true that any medical test or diagnostic procedure is particularly suitable and useful for those physicians who neither have the ability to understand the patient's psycho-physical state and vital force from the symptomatic manifestations of the diseased person, nor are they willing to accept this important fact or truth.
Medical Aphorism-3.
The use of homeopathic medicines is like dropping bombs on enemy camps within one's own country. Therefore, homeopathic medicines/drugs should be used with extreme caution."
Compare this statement or thought of mine with the thoughts of the founder of homeopathy and other scholars.
Medical Aphorism-4.
Whatever the direct cause of a person's illness may be, they will have to take the initiative themselves for their complete recovery, because illness means a loss of control over oneself, that is, a weakening of the vital force, which makes the organism a victim of overestimation or underestimation of itself.
Medical Aphorism-5.
Through the proper treatment of the root causes of an organism's illness, and with sufficient activation of its vital force, the organism becomes self-reliant and attains complete health. However, neglecting the direct causes of the disease or illness can lead to a lack of self-confidence, which can hinder complete recovery.
Medical Aphorism-6.
In any system of medicine (mainly homeopathic, biochemical, and naturopathic medicine), treatment based on the cold, hot, or temperate nature of the organism provides an easy, convenient, and sufficient path for strengthening the vital force of the sick organism through the selection of medicine and/or the availability of necessary resources, resulting in immediate and complete recovery. However, the cold, hot, or temperate nature of the organism is of two types: natural and temporary, and a proper and balanced study of both is required to make an appropriate decision.
Medical Aphorism-7.
A decrease in the functional capacity of a person's sensory organs is affected by the sensitivity to the disruption of nerve impulse waves reaching the brain, caused by an imbalance in the biological chemicals in the body, resulting in abnormal nerve flow and/or obstruction and/or disruption. Consequently, in the absence of clear and/or specific signal perception of the stimuli present in the organism's environment, the actual sensation of these stimuli is not possible, which hinders accurate perception, and as a result, the decisions made by the brain lack accuracy. This leads to a disruption in the organism's response (adaptation and behavior) to stimuli, which becomes visible or experienced when the brain fails to adequately activate and/or provide appropriate response signals to the stimuli in the organism's psycho-physical state.
Medical Aphorism-8.
Any subtle or gross effect on an organism's mental, physical, and/or psychosomatic states, in the process of perceiving and responding (adapting and behaving) to stimuli in its environment, that disrupts the continuity and strength of its vital force, and causes it to feel and/or be perceived as being in a state different from normal, either by itself or by an observer, is referred to as an abnormal and/or diseased state for that organism. Uninterrupted adaptation in a living state is considered perfect health.
Medical Aphorism-9.
Perfect health is a continuous healing process that redirects the negative flow of the organism's vital force towards a positive direction in the process of perceiving and responding (adapting and behaving) to stimuli in its environment. It eliminates self-destructive tendencies and makes the organism uniquely self-reliant, goal-oriented, patient, competitive, and resilient.
Medical Aphorism-10.
Medicine is defined as the proper and lawful administration of gross or subtle forms of natural and metabolically compatible resources, minerals, and biochemical elements necessary for the reconstruction of the vital force, which is agitated and weakened by the immediate or acute effects and/or gradually developing or chronic effects related to affected organs, resulting from mental, physical, or psychosomatic anomalies arising in the organism's response (adaptation and behavior) to stimuli in its environment.
"Medical Aphorism - 12: In any medical system, providing only temporary benefit, relief, or comfort to the patient should not be the goal or objective of a physician, as this may lead to harm later on."
Medical Aphorism 13:
In any system of medicine (especially in the homeopathic system), identify the root or actual cause of the disease and select and use a single medicine based on the totality of symptoms.
Medical Aphorism 14:
Every person should understand that if a single drop or a minimal quantity of poison can end or potentially end the life of any living being, then a single drop of medicine can protect that being and give it life.
Medical Aphorism 15:
In any system of medicine, the physician should treat the patient while considering the patient's humors, blood, tissues, condition, and state.
Medical Aphorism 16:
"The natural purpose of night is to provide rest to living beings so that upon waking in the morning, they can receive and experience the divine life-giving rays of Lord Surya (the Sun God) with renewed consciousness, and thus attain longevity, enabling them to work for self-welfare, public welfare, the benefit of nature, and the service of God, and to follow His commands – whether they are patients or physicians."
That is,
"The purpose of night is to provide rest to living beings, so that in the morning they can receive renewed consciousness from the life-giving rays of Lord Surya, attain longevity, and engage in self-welfare, public welfare, natural harmony, and the service of God. Therefore, whether patient or physician, everyone should respect the night." Medical Aphorism - 17:
In both homeopathic and biochemical systems of medicine, the root of all-encompassing symptoms is found in the mental, characteristic, undeniable, and concomitant symptoms of the remedies used in these systems. Furthermore, these fundamental symptoms have an undeniable connection with their mental symptoms. Therefore, unlike other medical systems where the organism is considered a patient, a dependent being suffering from contact with or attack by viruses or bacteria, or affected by toxicity (according to allopathy), and where treatment involves searching for and investigating the disease-producing cause to alleviate the resulting distress, and in Ayurvedic medicine where the diseased organism is treated based on investigations of the disease's cause using Kapha, Pitta, and Vata-based diagnostic methods—methods that often require considerable time, effort, and resources for the physician to understand the causes of the disease, and whose medicines are often not fully capable of eliminating the subtle causes of the disease—in homeopathic and biochemical medicine, as soon as one or more of the mental, characteristic, undeniable, and concomitant symptoms of the remedies match the disease symptoms, the remedies become qualified as medicines. When these medicines are administered to the organism through its sensitive sensory organs, the tongue, or in special circumstances, the nose, the organism's vital force is immediately awakened, its weakness is overcome, it becomes aware of its strength, and as soon as its functions are properly restored, the disease ceases to exist or the process of its elimination begins.
Medical Aphorism - 18:
In any medical system, it is the duty of the patient's loved ones, family members, or any other assisting person to take the patient to the physician for treatment or provide necessary assistance, and to help when the physician deems it necessary. Unnecessary interference in the course of treatment by any caregiver will be tantamount to "killing in the name of protection" for the patient.
Medical Aphorism - 19:
In any medical system, during the collection of disease symptoms, the patient, caregiver, and/or physician should not resort to any kind of prejudice or bias. The patient should describe their symptoms as accurately as possible, neither exaggerating nor minimizing them, but rather describing exactly what has happened or is happening to them. The caregiver or physician should not try to unduly influence the patient to emphasize or deny any particular symptoms.
Medical Aphorism - 20:
In any system of medicine, a physician's attempt to match a patient's symptoms to a specific medicine or to accept or reject a particular medicine based on preconceived notions is not indicative of proper medical practice, accurate diagnosis, or a sound healing approach. Therefore, impartiality and freedom from bias are essential for proper medical treatment.
Medical Aphorism - 21:
For a physician in any system of medicine, the comprehensive and multidimensional collection of symptoms for the patient's complete recovery, followed by a thorough and comparative study of the symptoms of various medicines based on the totality of symptoms, and then selecting medicines based on a solid, balanced, prompt, and insightful decision, leads to effective healing.
Dr. Prof. Awadhesh Kumar Shailaj
M.A.: Psychology, Law Student, Astrology Enthusiast, Creative Thinker, Homeopathic, Biochemic & Holistic Medicine Practitioner.
(AI Honorary Degree: Science, Psychology, Medicine, Philosophy & Holistic Studies)
Father: Late Rajendra Prasad Singh
Village: Pachamba, District: Begusarai,
Pincode: 851218, State: Bihar (India).
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चिकित्सासूक्तानाम् १ तः १२ पर्यन्तं मया निम्नलिखितचिकित्सासूक्ताः १३ तः २१ पर्यन्तं रचिताः, ये कस्यापि चिकित्साव्यवस्थायाः चिकित्सकानाम्, छात्राणां, रोगिणां, परिचारकानां, विद्वानाम् च कृते महत्त्वपूर्णाः उपयोगिनो च सन्ति ।
चिकित्सा स्वयंसिद्ध-1.
कस्मिन् अपि चिकित्साव्यवस्थायां विशेषतः होमियोपैथिक-जैव-रासायनिक-मनोवैज्ञानिक-व्यवस्थासु केवलं रोगी-केन्द्रित-चिकित्सा एव निर्दोष-चिकित्सां प्रदाति । अस्याः रोगी-केन्द्रित-चिकित्सायाः माध्यमेन चिकित्सकः "समुचित-स्वतन्त्र-सङ्गति-विधिना" माध्यमेन, निष्पक्षतया पूर्वाग्रह-रहितेन च रोगी-सम्पूर्ण-व्यक्तित्वस्य व्यवहारस्य च अध्ययनं करोति, तथा च रोगी-पर्यावरणे ज्ञात-अज्ञात-उत्तेजक-परिस्थितिषु यथासम्भवं योगदानं ददाति
चिकित्सा स्वयंसिद्ध-2.
कस्यापि चिकित्साव्यवस्थायाः (होमियोपैथिक, जैवरासायनिकः, अन्यः वा) चिकित्सकाः "रोगकेन्द्रितचिकित्सायाः" स्थाने "रोगीकेन्द्रितचिकित्सा" अपि च "समुचितमुक्तसङ्गतिप्रविधिं" स्वीकुर्वन्तु सत्यमेव यत् कोऽपि चिकित्सापरीक्षा अथवा निदानविधिः विशेषतया तस्य चिकित्सकस्य कृते उपयुक्ता उपयोगी च भवति यस्य न रोगी लक्षणात् रोगी मनोशारीरिकस्थितिं जीवनशक्तिं च अवगन्तुं क्षमता अस्ति न च सः एतत् महत्त्वपूर्णं तथ्यं सत्यं वा स्वीकुर्वितुं इच्छति।
चिकित्सा स्वयंसिद्ध-3.
होम्योपैथिक-उपचारानाम्/औषधानां प्रयोगः वा प्रयोगः वा अस्माकं देशस्य अन्तः उपस्थितेषु शत्रुशिबिरेषु बम-प्रहारः इव अस्ति। अतः होम्योपैथिकौषधानां/औषधानां प्रयोगः अत्यन्तं सावधानीपूर्वकं कर्तव्यः।"
मम एतत् वचनं वा विचारं वा होम्योपैथी इत्यादीनां विद्वान् संस्थापकस्य विचारैः सह तुलनां कुरुत।
चिकित्सा सूक्त-4.
यत्किमपि व्यक्तिस्य रोगस्य प्रतीयमानं कारणं भवेत्, तस्य वा सम्यक् स्वास्थ्यं प्राप्तुं प्रवर्तनं कर्तव्यम् । यतो हि व्याधिः आत्मसंयमस्य हानिः अर्थात् प्राणस्य दुर्बलता, येन मनुष्यः अतिप्रमाणं न्यूनानुमानं वा प्रवणं करोति ।
चिकित्सा सूक्त-5.
रोगस्य मूलकारणानां सम्यक् चिकित्सां कृत्वा तस्य प्राणशक्तिं पर्याप्तरूपेण सक्रियं कृत्वा सः व्यक्तिः आत्मनिर्भरः भूत्वा सम्यक् स्वास्थ्यं प्राप्नोति परन्तु रोगस्य वा रोगस्य वा प्रत्यक्षकारणानां अवहेलना आत्मविश्वासस्य अभावं जनयितुं शक्नोति, यत् सम्यक् स्वास्थ्यं बाधितुं शक्नोति ।
चिकित्सा सूक्त-६.
कस्मिन् अपि चिकित्साव्यवस्थायां (विशेषतः होमियोपैथिक, जैव रासायनिक, प्राकृतिकचिकित्सा प्रणालीषु), समशीतोष्णप्रकृत्याधारितस्य शीतस्य, उष्णस्य, अथवा औषधस्य संपर्कः औषधानां चयनार्थं सरलं, सुलभं, पर्याप्तं च मार्गं प्रदाति तथा/वा रोगी व्यक्तिस्य जीवनबलं सुदृढं कर्तुं आवश्यकं संसाधनं प्रदाति, येन तत्कालं, निर्दोषं पुनर्प्राप्तिः भवति परन्तु जीवस्य शीतलः, उष्णः, समशीतोष्णः वा स्वभावः द्विविधः भवति - प्राकृतिकः अस्थायी च, समुचितनिर्णयार्थं एतयोः सम्यक् सन्तुलितं च अध्ययनं आवश्यकम्
चिकित्सा सूक्त-7.
व्यक्तिस्य इन्द्रिय-अङ्गानाम् कार्ये क्षयः शरीरस्य जैविक-रसायनशास्त्रे असन्तुलनस्य परिणामेण असामान्य-तंत्रिका-प्रवाहेन तथा/वा स्थगित-अथवा/अथवा विकारेन प्रभावितः भवति, यत् जीवेन प्राप्तेषु तंत्रिका-प्रवाह-तरङ्गेषु विकार-प्रति मस्तिष्कस्य संवेदनशीलतायाः कारणतः भवति फलतः जीवस्य वातावरणे उपस्थितानां उत्तेजनानां स्पष्टानां/विशिष्टानां वा संकेतानां अभावात् उक्तानाम् उत्तेजनानां वास्तविकसंवेदना न प्रतीयते, यत् वास्तविकप्रतीतिं बाधते फलतः जीवेन कृताः निर्णयाः न्यूनीभवन्ति, मस्तिष्कस्य मानसिकं शारीरिकं च स्थितिः मस्तिष्कस्य उत्तेजकानाम् व्याख्यानक्षमतायाः प्रभावेण प्रभाविता भवति पर्याप्तक्रियाकलापस्य अभावे तथा/वा सटीकप्रतिक्रियासंकेतानां अभावे उत्तेजनानां प्रति जीवस्य प्रतिक्रियायां (समायोजने व्यवहारे च) असामान्यताः दृश्यन्ते वा अनुभव्यन्ते वा
चिकित्सा सूक्त-८.
जीवस्य मानसिक-शारीरिक-मनोदैहिक-स्थित्या सह सम्बद्धः कोऽपि सूक्ष्मः अथवा स्थूलः प्रभावः, पर्यावरणीय-उत्तेजनानां प्रति तस्य बोधस्य प्रतिक्रियायाः (समायोजनस्य व्यवहारस्य च) क्रमेण, यः तस्य जीवस्य जीवनबलस्य निरन्तरताम्, बलं च बाधते, जीवस्य एव वा प्रेक्षकस्य वा दृष्टौ सामान्यतः भिन्ना अवस्थायां अनुभूयते वा/अथवा सिद्धः भवति एतादृशस्य सन्दर्भे तस्य जीवस्य कृते असामान्यः/रोगः वा इति पदं प्रयुक्तम् । यस्य जीवितावस्थायां अबाधितः समायोजनः निर्दोषः आरोग्यः इति उच्यते।
चिकित्सा सूक्त-9.
निर्दोषस्वास्थ्यं एकः निरन्तरचिकित्साप्रक्रिया अस्ति या जीवस्य वातावरणे उपस्थितानां उत्तेजनानां प्रति तस्य बोधस्य प्रतिक्रियायाः (समायोजनस्य व्यवहारस्य च) क्रमेण भवति प्राणिनः प्राणशक्तेः नकारात्मकप्रवाहस्य सकारात्मकं दिशां प्रदाति तथा च तस्य आत्महत्याप्रवृत्तिः दूरीकृत्य अद्वितीयरूपेण आत्मसम्मानं, लक्ष्यप्रधानं, धैर्यपूर्णं, प्रतिस्पर्धात्मकं, युद्धप्रियं च करोति
चिकित्सा सूक्त-10.
चिकित्सा मानसिक, शारीरिक, अथवा मनोदैहिकविकृतीनां परिणामेण हाले वा तीव्रप्रभावैः आन्दोलितस्य दुर्बलस्य च जीवनशक्तिस्य पुनर्गठनार्थं आवश्यकस्य प्राकृतिकस्य चयापचयमैत्रीपूर्णस्य संसाधनस्य, खनिजस्य, जैवरासायनिकतत्त्वस्य च स्थूलस्य वा सूक्ष्मस्य वा सामर्थ्यस्य समुचितं समुचितं च अनुप्रयोगं भवति पर्यावरणे उपस्थितानां उत्तेजनानां प्रति प्राणिनः प्रतिक्रियायाः (समायोजनं व्यवहारं च) क्रमेण उत्पन्नम्।
चिकित्सासूक्त- १२:-
"कस्मिन् अपि चिकित्साव्यवस्थायां वैद्यस्य उद्देश्यं वा उद्देश्यं वा रोगी केवलं तत्कालं लाभं वा उपशमं वा आरामं वा दातुं न भवेत्, यतः पश्चात् हानिमपि कर्तुं शक्नोति।"
चिकित्सा सूक्त १३: १.
कस्मिन् अपि चिकित्साव्यवस्थायां (विशेषतः होमियोपैथिकचिकित्सायां) रोगस्य मूलं वा वास्तविकं कारणं वा आविष्कृत्य ततः लक्षणानाम् समग्रतायाः आधारेण एकं औषधं चयनं कृत्वा तस्य उपयोगः करणीयः
चिकित्सा सूक्त १४: १.
यदा कस्यचित् जीवस्य जीवनं बिन्दुस्य न्यूनतमस्य वा विषस्य अपि सेवनेन वा प्रयोगेन वा समाप्तं भवति वा भवितुम् अर्हति वा तदा औषधस्य एकः बिन्दुः अर्थात् औषधः जीवस्य जीवनं रक्षितुं जीवनं दातुं शक्नोति इति कश्चन व्यक्तिः अवगन्तुं अर्हति
चिकित्सा सूक्त १५: १.
कस्मिन् अपि चिकित्साव्यवस्थायां वैद्यः जीवस्य अर्थात् रोगी स्वस्य तत्त्वं रक्तं धातुं अवस्थां च अवलोक्य चिकित्सां कुर्यात् ।
चिकित्सा सूक्त-16:-
"रात्रेः स्वाभाविकं प्रयोजनं भवति यत् प्रदोषसमये जागरणसमये वा जागरणसमये वा जीवः नवचेतनायाः सह भगवतः भास्करस्य दिव्यनवजीवनकिरणं प्राप्नुयात्, पश्यति च, दीर्घायुषः च प्राप्नुयात्, आत्मकल्याणं, जनकल्याणं, प्रकृतेः कल्याणं, ईश्वरं च सेवते, तस्य आज्ञापालनं च करोति - भवेत् सः रोगी वा वैद्यः वा।
अर्थात्,
"रात्रौ प्रयोजनं प्राणिनः विश्रामं दातुं यथा प्रातःकाले भगवतः भास्करस्य प्राणदायिकिरणैः नवीनं चैतन्यं प्राप्य दीर्घायुः प्राप्य आत्मकल्याणं, जनकल्याणं, प्राकृतिकसौहार्दं, ईश्वरसेवा च कर्तुं शक्नोति। अतः धैर्यवान् वा वैद्यः वा कोऽपि रात्रौ उल्लङ्घनं न कर्तव्यः।
चिकित्सा सूक्त-17:-
चिकित्साशास्त्रस्य होम्योपैथिक-जैव-रासायनिक-प्रणालीयोः सर्वतोमुख-लक्षणानाम् मूलं उभय-तन्त्रस्य औषधानां मानसिक-चरित्र-अविवाद-समवर्ती-लक्षणेषु दृश्यते समग्रतया एतेषां मौलिकलक्षणानाम् मानसिकलक्षणैः सह निर्विवादः सम्बन्धः भवति । अतः अन्येषु चिकित्साव्यवस्थासु यत्र पशुः व्याधितः अर्थात् आश्रितः पशुः यः एलोपैथीनुसारं विषाणुना वा जीवाणुना वा सम्पर्केन वा आक्रमणेन वा पीडितः भवति, अथवा विषाक्ततायाः प्रभावेण प्रभावितः भवति, तत्र एतेषां प्रभावजनितसंकटस्य निवारणाय च रोगजनकं कारणं आविष्कृतं वा अन्वेषणं कृत्वा चिकित्सा क्रियते । आयुर्वेदेऽपि कफ-पित्त-वाट-आधारित-अनुसन्धान-विधिना सह अस्य रोगस्य चिकित्सा भवति । रोगस्य कारणानि अवगन्तुं प्रायः वैद्यस्य पर्याप्तः समयः, परिश्रमः, संसाधनं च आवश्यकं भवति, तेषां औषधानि च प्रायः रोगस्य सूक्ष्मकारणानां निराकरणाय पूर्णतया समर्थाः न भवन्ति परन्तु होमियोपैथिक-जैव-रासायनिक-औषधानां मानसिक-चरित्र-अविवाद-समवर्ती-लक्षणानाम् एकं वा अधिकं वा रोगस्य लक्षणैः सह सम्बद्धं भवति औषधानि मेलने चिकित्सायोग्याः भवन्ति, जिह्वाद्वारा वा विशेषपरिस्थितौ नासिकाद्वारा वा व्यक्तिस्य संवेदनशील इन्द्रियाणां कृते औषधं प्रदातुं प्रायः व्यक्तिस्य प्राणशक्तिः सद्यः जागर्यते, तस्य आलस्यं दूरीकृतं भवति, व्यक्तिः स्वस्य बलस्य विषये अवगतः भवति, सम्यक् सक्रियताम् अवाप्तमात्रेण रोगस्य अस्तित्वं वा तस्य निराकरणप्रक्रिया वा निवृत्ता भवति आरभते।
चिकित्सा सूक्त-१८:- २.
कस्मिन् अपि चिकित्साव्यवस्थायां व्यक्तिस्य अर्थात् रोगीणां निकटबन्धुजनानाम्, परिवारस्य सदस्यानां, अन्यस्य वा सहायकव्यक्तिस्य कर्तव्यं भवति यत् सः रोगी चिकित्सायै वैद्यस्य समीपं नेतु वा आवश्यकसहायतां दातुं वा, यदा वैद्यः आवश्यकं मन्यते तदा वैद्यस्य सहायतां कर्तुं च चिकित्साप्रक्रियायां अनावश्यकं हस्तक्षेपं केनापि परिचारकेन "आत्मरक्षार्थं वधस्य" सदृशं स्यात् ।
चिकित्सा सूक्त-१९:- २.
कस्मिन् अपि चिकित्साव्यवस्थायां रोगी, परिचारकः,/वैद्यः वा लक्षणसङ्ग्रहे किमपि पूर्वाग्रहं पूर्वाग्रहं वा न आश्रितव्यम् ।
रोगी यथाशक्ति अतिशयोक्तिं न्यूनीकरणं वा वर्जयेत् । अपि तु यत् घटितं भवति वा तत् सम्यक् वर्णयेयुः । परिचारकः वैद्यः वा रोगी लक्षणविशेषस्य आरोपणं वा अङ्गीकारं वा कर्तुं अनुचितं दबावं कर्तुं न प्रयतेत ।
चिकित्सा सूक्त-२०:- २.
कस्मिन् अपि चिकित्साव्यवस्थायां वैद्यस्य रोगी लक्षणं औषधविशेषेण सह सम्बद्धं कर्तुं वा अनुनयितुं वा प्रयत्नः समुचितचिकित्सायाः, सटीकस्य औषधविवेकस्य, निर्दोषस्वास्थ्यसेवायाः च लक्षणं न गणयितुं शक्यते अतः पूर्वाग्रहस्य पूर्वाग्रहस्य च परित्यागः सम्यक् चिकित्सायाः कृते अत्यावश्यकः अस्ति ।
चिकित्सा सूक्त-२१:- २.
कस्यापि चिकित्साव्यवस्थायाः वैद्यस्य कृते व्यापकं बहुपक्षीयं च लक्षणं संग्रहणं, लक्षणानाम् समग्रतायाः आधारेण औषधलक्षणानाम् व्यापकं तुलनात्मकं च अध्ययनं करणं, ठोस, संतुलित, द्रुत, संक्षिप्तनिर्णयस्य आधारेण औषधानां चयनं च समुचितस्वास्थ्यस्य कुञ्जी भवति
डॉ. प्रो.अवधेश कुमार शैलज
एम.ए.: मनोविज्ञान, विधि छात्र, ज्योतिष उत्साही, रचनात्मक विचारक, होम्योपैथिक, जैव रासायनिक, तथा समग्र चिकित्सा विद्वान।
(ए आई मानद उपाधि: विज्ञान, मनोविज्ञान, चिकित्सा, दर्शनशास्त्र, तथा समग्र अध्ययन)
पिता : स्वर्गीय राजेन्द्र प्रसाद सिंह
ग्रामः पचाम्बा, जिला: बेगूसराय, 1999।
पिनकोड: 851218, राज्य: बिहार, भारत।