सोमवार, 2 नवंबर 2026

डॉ. अवधेश कुमार शैलज जी, प्रस्तुत चित्र में उल्लिखित 'जनसंख्या नीति' का अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि यह केवल जनसंख्या नियंत्रण का प्रस्ताव नहीं है, बल्कि राष्ट्रहित, नागरिक उत्तरदायित्व, सामाजिक समानता, पारिवारिक अनुशासन तथा भावी पीढ़ियों के आत्मनिर्भर विकास को एक साथ जोड़ने का प्रयास है।
इसमें शैलज लोकतांत्रिक दल की विचारधारा के अनुरूप कुछ महत्त्वपूर्ण सिद्धांत दिखाई देते हैं। इसका विश्लेषण निम्नलिखित आधारों पर प्रस्तुत है।
1. प्रस्तुत जनसंख्या नीति का मूल स्वरूप
चित्र में उल्लिखित नीति के प्रमुख बिंदु हैं:
राष्ट्रहित एवं जनहित में जनसंख्या नीति का निर्धारण।
जाति, धर्म एवं वर्ग के भेदभाव के बिना वयस्क दम्पतियों के लिए अधिकतम दो संतान का मानक।
प्रत्येक नागरिक द्वारा सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक अवधारणाओं के आलोक में जनसंख्या विस्तार के प्रति उत्तरदायित्व।
जनसंख्या नियंत्रण नीति सभी धर्म, वर्ग, जाति एवं क्षेत्र के लोगों पर समान रूप से लागू करना।
जनसंख्या नियंत्रण नीति का पालन नहीं करने वालों को सरकारी लाभों से वंचित करना।
प्रत्येक नागरिक द्वारा अपनी तथा अपनी भावी संतान के सम्यक एवं आत्मनिर्भर विकास का उत्तरदायित्व स्वीकार करना।
इन बिंदुओं से एक ऐसी जनसंख्या नीति का स्वरूप उभरता है जिसमें अधिकारों के साथ नागरिक कर्तव्यों को भी महत्त्व दिया गया है।
2. संवैधानिक दृष्टिकोण से विश्लेषण
भारत के संविधान के संदर्भ में इस नीति का मूल्यांकन अत्यंत आवश्यक है।
संवैधानिक प्रावधान
जनसंख्या नीति से संबंध
अनुच्छेद 14
सभी नागरिकों के लिए समानता
अनुच्छेद 15
धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव का निषेध
अनुच्छेद 21
जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
अनुच्छेद 21
प्रजनन संबंधी निर्णयों में व्यक्तिगत स्वायत्तता का संरक्षण
अनुच्छेद 38
सामाजिक व्यवस्था एवं लोककल्याण की अभिवृद्धि
अनुच्छेद 39
नागरिकों के स्वास्थ्य एवं जीवन स्तर से संबंधित राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत
अनुच्छेद 47
पोषण स्तर, जीवन स्तर एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार
अनुच्छेद 51A
नागरिकों के मौलिक कर्तव्य
विशेष रूप से अनुच्छेद 47 इस नीति के लिए महत्त्वपूर्ण है। राज्य का दायित्व है कि वह पोषण स्तर, जीवन स्तर तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करे।
इसलिए जनसंख्या नीति को केवल जन्मदर नियंत्रित करने तक सीमित न रखकर मानव संसाधन के समुचित विकास से जोड़ना चाहिए।
3. दो संतान नीति : राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
दो संतान की नीति का उद्देश्य सामान्यतः निम्नलिखित होता है:
जनसंख्या वृद्धि की दर को नियंत्रित करना।
परिवार की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करना।
बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना।
मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य में सुधार करना।
प्राकृतिक संसाधनों पर जनसंख्या का अनावश्यक दबाव कम करना।
प्रत्येक बच्चे के समुचित विकास की संभावना बढ़ाना।
लेकिन यहाँ एक महत्त्वपूर्ण तथ्य पर ध्यान देना आवश्यक है।
भारत की राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000 में स्वैच्छिक एवं सूचित पारिवारिक निर्णयों को प्राथमिकता दी गई है। इसमें जबरन जनसंख्या नियंत्रण के बजाय परिवार नियोजन की सुविधाओं को सुलभ बनाने पर बल दिया गया है।
भारत सरकार के अनुसार NFHS-5 (2019-21) में देश की कुल प्रजनन दर (TFR) 2.0 दर्ज की गई, जबकि प्रतिस्थापन स्तर 2.1 माना जाता है। �
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इसका अर्थ है कि भारत में जनसंख्या नियंत्रण के साथ-साथ क्षेत्रीय जनसांख्यिकीय असमानताओं को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
उदाहरणार्थ, NFHS-5 के अनुसार बिहार की कुल प्रजनन दर 3.0 थी, जो राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक थी। �
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अतः संपूर्ण भारत के लिए नीति बनाते समय राज्यों की सामाजिक, आर्थिक एवं जनसांख्यिकीय परिस्थितियों का अध्ययन आवश्यक है।
4. सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के आलोक में
इस विषय में एक महत्त्वपूर्ण निर्णय है:
जावेद बनाम हरियाणा राज्य (2003)
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने हरियाणा के उस कानून को संवैधानिक माना था जिसके अनुसार दो से अधिक जीवित संतान वाले व्यक्ति पंचायत चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो सकते थे।
न्यायालय ने इसे परिवार कल्याण एवं जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्य से संबंधित एक वैधानिक अयोग्यता माना।
लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह निर्णय स्थानीय निकायों के चुनाव लड़ने की पात्रता से संबंधित था। इसे प्रत्येक नागरिक पर दो संतान की अनिवार्यता लागू करने की स्वतः संवैधानिक स्वीकृति नहीं माना जा सकता। �
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वहीं, सर्वोच्च न्यायालय ने प्रजनन संबंधी स्वतंत्रता एवं महिलाओं के व्यक्तिगत निर्णयों को भी अनुच्छेद 21 के अंतर्गत महत्त्वपूर्ण संरक्षण प्रदान किया है।
इसलिए दो संतान नीति बनाते समय व्यक्तिगत स्वतंत्रता, महिला के स्वास्थ्य तथा प्रजनन संबंधी निर्णयों का सम्मान आवश्यक है।
5. प्रस्तुत नीति के दो महत्त्वपूर्ण प्रावधानों की समीक्षा
मेरी दृष्टि में इस प्रारूप के दो प्रावधानों पर विशेष विचार अपेक्षित है।
(क) नीति का पालन नहीं करने वालों को सरकारी लाभों से वंचित करना।
इसमें कहा गया है कि जनसंख्या नियंत्रण नीति नहीं मानने वालों को आम लोगों को मिलने वाले सभी सरकारी लाभों से वंचित होना पड़ेगा।
इस प्रावधान में कुछ व्यावहारिक एवं संवैधानिक कठिनाइयाँ हैं।
तीसरी संतान का जन्म होने पर पहली एवं दूसरी संतान को सरकारी लाभों से वंचित करना न्यायसंगत नहीं होगा।
बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य एवं पोषण के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
गरीब एवं आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर इसका अधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
महिलाओं को अनावश्यक सामाजिक एवं पारिवारिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
गर्भनिरोधक साधनों की विफलता, बहुसंतान जन्म तथा अन्य चिकित्सकीय परिस्थितियों के लिए विशेष प्रावधान आवश्यक होंगे।
मेरा सुझाव: सरकारी लाभों को पूर्णतः समाप्त करने के स्थान पर प्रोत्साहन, जागरूकता, परिवार नियोजन की सुविधाएँ तथा उपयुक्त वैधानिक प्रावधानों का संतुलित प्रयोग किया जाना चाहिए।
विशेषकर बच्चों के मौलिक अधिकार किसी भी परिस्थिति में प्रभावित नहीं होने चाहिए।
(ख) प्रत्येक नागरिक को अपनी भावी संतान के विकास के लिए उत्तरदायी मानना।
यह प्रावधान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
यह केवल जनसंख्या नियंत्रण की बात नहीं करता, बल्कि संतान के प्रति माता-पिता के दायित्व को भी स्वीकार करता है।
इसे और अधिक व्यापक बनाया जा सकता है:
प्रत्येक संतान को समुचित शिक्षा।
पौष्टिक भोजन एवं स्वास्थ्य सुविधाएँ।
नैतिक एवं सामाजिक संस्कार।
रोजगारोन्मुख कौशल विकास।
आत्मनिर्भरता एवं नागरिक चेतना।
बालिका एवं बालक के लिए समान अवसर।
इस प्रकार जनसंख्या नीति को मानव विकास नीति के साथ जोड़ना चाहिए।
6. शैलज जनसंख्या नीति की मौलिक विशेषताएँ
आपके प्रस्तुत प्रारूप में मुझे निम्नलिखित पाँच वैचारिक विशेषताएँ दिखाई देती हैं।
क्रम
वैचारिक विशेषता
मूल उद्देश्य
1
राष्ट्रहित
राष्ट्रीय संसाधनों का संतुलित उपयोग
2
सामाजिक समानता
जाति, धर्म एवं वर्ग से परे समान नीति
3
नागरिक उत्तरदायित्व
जनसंख्या विस्तार के प्रति जिम्मेदारी
4
पारिवारिक उत्तरदायित्व
संतान का समुचित विकास
5
आत्मनिर्भरता
भावी पीढ़ी को सक्षम बनाना
इस दृष्टिकोण से यह नीति केवल जनसंख्या नियंत्रण तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि सामाजिक एवं आर्थिक उत्तरदायित्व का एक व्यापक सिद्धांत बन जाती है।
7. मेरी ओर से कुछ महत्त्वपूर्ण संशोधन सुझाव
शैलज लोकतांत्रिक दल के संविधान एवं घोषणापत्र में इस नीति को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए छह विषय जोड़ना उचित होगा।
स्वैच्छिक परिवार नियोजन: प्रत्येक दम्पति को वैज्ञानिक जानकारी एवं सुरक्षित परिवार नियोजन सुविधाएँ उपलब्ध कराना।
समानता: जाति, धर्म, वर्ग, क्षेत्र एवं आर्थिक स्थिति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं।
मातृ स्वास्थ्य: गर्भवती महिलाओं एवं प्रसूता माताओं के स्वास्थ्य की विशेष सुरक्षा।
बाल अधिकार: संतान की संख्या के आधार पर किसी बच्चे के शिक्षा, स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधी अधिकारों का हनन नहीं।
जनसंख्या एवं संसाधन संतुलन: उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों, रोजगार, आवास एवं पर्यावरण के अनुसार दीर्घकालीन योजना।
जनसांख्यिकीय संतुलन: अधिक प्रजनन दर वाले क्षेत्रों में विशेष जागरूकता एवं स्वास्थ्य कार्यक्रम तथा कम प्रजनन दर वाले क्षेत्रों में वृद्ध होती आबादी एवं कार्यशील जनशक्ति की आवश्यकताओं का ध्यान।
8. प्रस्तावित शैलज जनसंख्या नीति का अधिक परिष्कृत वैचारिक स्वरूप
आपके मूल प्रारूप की भावना को सुरक्षित रखते हुए मैं इसका निम्नलिखित संशोधित रूप प्रस्तावित करता हूँ।
Writing
जनसंख्या नीति
राष्ट्रहित एवं जनहित में वैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं पर्यावरणीय परिस्थितियों के सम्यक अध्ययन के आधार पर राष्ट्रीय जनसंख्या नीति का निर्धारण होगा।
राष्ट्रीय जनसंख्या नीति का मूल उद्देश्य संतुलित जनसंख्या वृद्धि, स्वस्थ परिवार, समुचित मानव संसाधन विकास तथा भावी पीढ़ियों की आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करना होगा।
राष्ट्र के सभी जाति, धर्म, वर्ग एवं क्षेत्र के नागरिकों के लिए समान जनसंख्या नीति का सिद्धांत स्वीकार किया जाएगा। परिवार नियोजन के अंतर्गत अधिकतम दो संतान के आदर्श को प्रोत्साहित किया जाएगा।
प्रत्येक नागरिक को अपने सामाजिक, सांस्कृतिक एवं पारिवारिक उत्तरदायित्वों के प्रति जागरूक करते हुए स्वैच्छिक एवं उत्तरदायी परिवार नियोजन के लिए प्रेरित किया जाएगा।
राज्य द्वारा परिवार नियोजन, मातृ स्वास्थ्य, शिशु स्वास्थ्य, महिला शिक्षा एवं जनसंख्या जागरूकता की समुचित सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँगी।
जनसंख्या नीति के पालन को प्रोत्साहित करने के लिए न्यायसंगत एवं संविधानसम्मत प्रावधान निर्धारित किए जाएँगे। किसी भी परिस्थिति में बच्चों के मौलिक अधिकारों एवं निर्दोष आश्रितों के हितों का हनन नहीं होगा।
प्रत्येक नागरिक अपनी संतान के समुचित शारीरिक, मानसिक, शैक्षणिक, नैतिक एवं आत्मनिर्भर विकास के प्रति उत्तरदायी होगा।
राष्ट्रीय जनसंख्या नीति का निर्धारण एवं क्रियान्वयन करते समय जनसांख्यिकीय विविधता, क्षेत्रीय आवश्यकताओं, प्राकृतिक संसाधनों एवं भावी राष्ट्रीय हितों का विशेष ध्यान रखा जाएगा।
9. अंतिम निष्कर्ष
डॉ. शैलज जी, आपके मूल प्रारूप की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें जनसंख्या को केवल व्यक्तियों की संख्या नहीं, बल्कि राष्ट्र के सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक भविष्य से जोड़कर देखा गया है।
फिर भी एक महत्त्वपूर्ण वैचारिक अंतर स्पष्ट रखना चाहिए:
जनसंख्या नियंत्रण का उद्देश्य जन्मों की संख्या सीमित करना है।
जनसंख्या प्रबंधन का उद्देश्य जनसंख्या एवं संसाधनों में संतुलन स्थापित करना है।
जनसंख्या विकास का उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति को राष्ट्र की उत्पादक एवं सक्षम मानव शक्ति बनाना है।
मेरी राय में शैलज लोकतांत्रिक दल को केवल जनसंख्या नियंत्रण की नीति तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे 'संतुलित जनसंख्या, स्वस्थ परिवार एवं आत्मनिर्भर मानव संसाधन' के त्रिस्तरीय सिद्धांत पर विकसित करना अधिक दूरदर्शी होगा।
एक विशेष सुझाव: आपके मूल प्रारूप में 'आयुष्मान की सीमा' शब्दावली का अर्थ स्पष्ट नहीं हो रहा है। यदि इससे आपका आशय आयु-सीमा, प्रजनन योग्य आयु अथवा किसी अन्य पात्रता से है, तो उसे स्पष्ट करना आवश्यक है। कानूनी प्रारूप में अस्पष्ट शब्दावली नहीं रहनी चाहिए।
इस विषय को शैलज लोकतांत्रिक दल के संविधान में एक स्वतंत्र एवं विस्तृत अध्याय के रूप में स्थान देना उचित होगा।

डॉ. अवधेश कुमार शैलज जी, प्रस्तुत चित्र में उल्लिखित 'जनसंख्या नीति' का अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि यह केवल जनसंख्या नियंत्रण का प्रस्ताव नहीं है, बल्कि राष्ट्रहित, नागरिक उत्तरदायित्व, सामाजिक समानता, पारिवारिक अनुशासन तथा भावी पीढ़ियों के आत्मनिर्भर विकास को एक साथ जोड़ने का प्रयास है।
इसमें शैलज लोकतांत्रिक दल की विचारधारा के अनुरूप कुछ महत्त्वपूर्ण सिद्धांत दिखाई देते हैं। इसका विश्लेषण निम्नलिखित आधारों पर प्रस्तुत है।
1. प्रस्तुत जनसंख्या नीति का मूल स्वरूप
चित्र में उल्लिखित नीति के प्रमुख बिंदु हैं:
राष्ट्रहित एवं जनहित में जनसंख्या नीति का निर्धारण।
जाति, धर्म एवं वर्ग के भेदभाव के बिना वयस्क दम्पतियों के लिए अधिकतम दो संतान का मानक।
प्रत्येक नागरिक द्वारा सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक अवधारणाओं के आलोक में जनसंख्या विस्तार के प्रति उत्तरदायित्व।
जनसंख्या नियंत्रण नीति सभी धर्म, वर्ग, जाति एवं क्षेत्र के लोगों पर समान रूप से लागू करना।
जनसंख्या नियंत्रण नीति का पालन नहीं करने वालों को सरकारी लाभों से वंचित करना।
प्रत्येक नागरिक द्वारा अपनी तथा अपनी भावी संतान के सम्यक एवं आत्मनिर्भर विकास का उत्तरदायित्व स्वीकार करना।
इन बिंदुओं से एक ऐसी जनसंख्या नीति का स्वरूप उभरता है जिसमें अधिकारों के साथ नागरिक कर्तव्यों को भी महत्त्व दिया गया है।
2. संवैधानिक दृष्टिकोण से विश्लेषण
भारत के संविधान के संदर्भ में इस नीति का मूल्यांकन अत्यंत आवश्यक है।
संवैधानिक प्रावधान
जनसंख्या नीति से संबंध
अनुच्छेद 14
सभी नागरिकों के लिए समानता
अनुच्छेद 15
धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव का निषेध
अनुच्छेद 21
जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
अनुच्छेद 21
प्रजनन संबंधी निर्णयों में व्यक्तिगत स्वायत्तता का संरक्षण
अनुच्छेद 38
सामाजिक व्यवस्था एवं लोककल्याण की अभिवृद्धि
अनुच्छेद 39
नागरिकों के स्वास्थ्य एवं जीवन स्तर से संबंधित राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत
अनुच्छेद 47
पोषण स्तर, जीवन स्तर एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार
अनुच्छेद 51A
नागरिकों के मौलिक कर्तव्य
विशेष रूप से अनुच्छेद 47 इस नीति के लिए महत्त्वपूर्ण है। राज्य का दायित्व है कि वह पोषण स्तर, जीवन स्तर तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करे।
इसलिए जनसंख्या नीति को केवल जन्मदर नियंत्रित करने तक सीमित न रखकर मानव संसाधन के समुचित विकास से जोड़ना चाहिए।
3. दो संतान नीति : राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
दो संतान की नीति का उद्देश्य सामान्यतः निम्नलिखित होता है:
जनसंख्या वृद्धि की दर को नियंत्रित करना।
परिवार की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करना।
बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना।
मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य में सुधार करना।
प्राकृतिक संसाधनों पर जनसंख्या का अनावश्यक दबाव कम करना।
प्रत्येक बच्चे के समुचित विकास की संभावना बढ़ाना।
लेकिन यहाँ एक महत्त्वपूर्ण तथ्य पर ध्यान देना आवश्यक है।
भारत की राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000 में स्वैच्छिक एवं सूचित पारिवारिक निर्णयों को प्राथमिकता दी गई है। इसमें जबरन जनसंख्या नियंत्रण के बजाय परिवार नियोजन की सुविधाओं को सुलभ बनाने पर बल दिया गया है।
भारत सरकार के अनुसार NFHS-5 (2019-21) में देश की कुल प्रजनन दर (TFR) 2.0 दर्ज की गई, जबकि प्रतिस्थापन स्तर 2.1 माना जाता है। �
Press Information Bureau +1
इसका अर्थ है कि भारत में जनसंख्या नियंत्रण के साथ-साथ क्षेत्रीय जनसांख्यिकीय असमानताओं को भी ध्यान में रखना आवश्यक है।
उदाहरणार्थ, NFHS-5 के अनुसार बिहार की कुल प्रजनन दर 3.0 थी, जो राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक थी। �
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अतः संपूर्ण भारत के लिए नीति बनाते समय राज्यों की सामाजिक, आर्थिक एवं जनसांख्यिकीय परिस्थितियों का अध्ययन आवश्यक है।
4. सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के आलोक में
इस विषय में एक महत्त्वपूर्ण निर्णय है:
जावेद बनाम हरियाणा राज्य (2003)
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने हरियाणा के उस कानून को संवैधानिक माना था जिसके अनुसार दो से अधिक जीवित संतान वाले व्यक्ति पंचायत चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो सकते थे।
न्यायालय ने इसे परिवार कल्याण एवं जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्य से संबंधित एक वैधानिक अयोग्यता माना।
लेकिन ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह निर्णय स्थानीय निकायों के चुनाव लड़ने की पात्रता से संबंधित था। इसे प्रत्येक नागरिक पर दो संतान की अनिवार्यता लागू करने की स्वतः संवैधानिक स्वीकृति नहीं माना जा सकता। �
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वहीं, सर्वोच्च न्यायालय ने प्रजनन संबंधी स्वतंत्रता एवं महिलाओं के व्यक्तिगत निर्णयों को भी अनुच्छेद 21 के अंतर्गत महत्त्वपूर्ण संरक्षण प्रदान किया है।
इसलिए दो संतान नीति बनाते समय व्यक्तिगत स्वतंत्रता, महिला के स्वास्थ्य तथा प्रजनन संबंधी निर्णयों का सम्मान आवश्यक है।
5. प्रस्तुत नीति के दो महत्त्वपूर्ण प्रावधानों की समीक्षा
मेरी दृष्टि में इस प्रारूप के दो प्रावधानों पर विशेष विचार अपेक्षित है।
(क) नीति का पालन नहीं करने वालों को सरकारी लाभों से वंचित करना।
इसमें कहा गया है कि जनसंख्या नियंत्रण नीति नहीं मानने वालों को आम लोगों को मिलने वाले सभी सरकारी लाभों से वंचित होना पड़ेगा।
इस प्रावधान में कुछ व्यावहारिक एवं संवैधानिक कठिनाइयाँ हैं।
तीसरी संतान का जन्म होने पर पहली एवं दूसरी संतान को सरकारी लाभों से वंचित करना न्यायसंगत नहीं होगा।
बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य एवं पोषण के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
गरीब एवं आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर इसका अधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
महिलाओं को अनावश्यक सामाजिक एवं पारिवारिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
गर्भनिरोधक साधनों की विफलता, बहुसंतान जन्म तथा अन्य चिकित्सकीय परिस्थितियों के लिए विशेष प्रावधान आवश्यक होंगे।
मेरा सुझाव: सरकारी लाभों को पूर्णतः समाप्त करने के स्थान पर प्रोत्साहन, जागरूकता, परिवार नियोजन की सुविधाएँ तथा उपयुक्त वैधानिक प्रावधानों का संतुलित प्रयोग किया जाना चाहिए।
विशेषकर बच्चों के मौलिक अधिकार किसी भी परिस्थिति में प्रभावित नहीं होने चाहिए।
(ख) प्रत्येक नागरिक को अपनी भावी संतान के विकास के लिए उत्तरदायी मानना।
यह प्रावधान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
यह केवल जनसंख्या नियंत्रण की बात नहीं करता, बल्कि संतान के प्रति माता-पिता के दायित्व को भी स्वीकार करता है।
इसे और अधिक व्यापक बनाया जा सकता है:
प्रत्येक संतान को समुचित शिक्षा।
पौष्टिक भोजन एवं स्वास्थ्य सुविधाएँ।
नैतिक एवं सामाजिक संस्कार।
रोजगारोन्मुख कौशल विकास।
आत्मनिर्भरता एवं नागरिक चेतना।
बालिका एवं बालक के लिए समान अवसर।
इस प्रकार जनसंख्या नीति को मानव विकास नीति के साथ जोड़ना चाहिए।
6. शैलज जनसंख्या नीति की मौलिक विशेषताएँ
आपके प्रस्तुत प्रारूप में मुझे निम्नलिखित पाँच वैचारिक विशेषताएँ दिखाई देती हैं।
क्रम
वैचारिक विशेषता
मूल उद्देश्य
1
राष्ट्रहित
राष्ट्रीय संसाधनों का संतुलित उपयोग
2
सामाजिक समानता
जाति, धर्म एवं वर्ग से परे समान नीति
3
नागरिक उत्तरदायित्व
जनसंख्या विस्तार के प्रति जिम्मेदारी
4
पारिवारिक उत्तरदायित्व
संतान का समुचित विकास
5
आत्मनिर्भरता
भावी पीढ़ी को सक्षम बनाना
इस दृष्टिकोण से यह नीति केवल जनसंख्या नियंत्रण तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि सामाजिक एवं आर्थिक उत्तरदायित्व का एक व्यापक सिद्धांत बन जाती है।
7. मेरी ओर से कुछ महत्त्वपूर्ण संशोधन सुझाव
शैलज लोकतांत्रिक दल के संविधान एवं घोषणापत्र में इस नीति को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए छह विषय जोड़ना उचित होगा।
स्वैच्छिक परिवार नियोजन: प्रत्येक दम्पति को वैज्ञानिक जानकारी एवं सुरक्षित परिवार नियोजन सुविधाएँ उपलब्ध कराना।
समानता: जाति, धर्म, वर्ग, क्षेत्र एवं आर्थिक स्थिति के आधार पर कोई भेदभाव नहीं।
मातृ स्वास्थ्य: गर्भवती महिलाओं एवं प्रसूता माताओं के स्वास्थ्य की विशेष सुरक्षा।
बाल अधिकार: संतान की संख्या के आधार पर किसी बच्चे के शिक्षा, स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधी अधिकारों का हनन नहीं।
जनसंख्या एवं संसाधन संतुलन: उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों, रोजगार, आवास एवं पर्यावरण के अनुसार दीर्घकालीन योजना।
जनसांख्यिकीय संतुलन: अधिक प्रजनन दर वाले क्षेत्रों में विशेष जागरूकता एवं स्वास्थ्य कार्यक्रम तथा कम प्रजनन दर वाले क्षेत्रों में वृद्ध होती आबादी एवं कार्यशील जनशक्ति की आवश्यकताओं का ध्यान।
8. प्रस्तावित शैलज जनसंख्या नीति का अधिक परिष्कृत वैचारिक स्वरूप
आपके मूल प्रारूप की भावना को सुरक्षित रखते हुए मैं इसका निम्नलिखित संशोधित रूप प्रस्तावित करता हूँ।
Writing
जनसंख्या नीति
राष्ट्रहित एवं जनहित में वैज्ञानिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं पर्यावरणीय परिस्थितियों के सम्यक अध्ययन के आधार पर राष्ट्रीय जनसंख्या नीति का निर्धारण होगा।
राष्ट्रीय जनसंख्या नीति का मूल उद्देश्य संतुलित जनसंख्या वृद्धि, स्वस्थ परिवार, समुचित मानव संसाधन विकास तथा भावी पीढ़ियों की आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करना होगा।
राष्ट्र के सभी जाति, धर्म, वर्ग एवं क्षेत्र के नागरिकों के लिए समान जनसंख्या नीति का सिद्धांत स्वीकार किया जाएगा। परिवार नियोजन के अंतर्गत अधिकतम दो संतान के आदर्श को प्रोत्साहित किया जाएगा।
प्रत्येक नागरिक को अपने सामाजिक, सांस्कृतिक एवं पारिवारिक उत्तरदायित्वों के प्रति जागरूक करते हुए स्वैच्छिक एवं उत्तरदायी परिवार नियोजन के लिए प्रेरित किया जाएगा।
राज्य द्वारा परिवार नियोजन, मातृ स्वास्थ्य, शिशु स्वास्थ्य, महिला शिक्षा एवं जनसंख्या जागरूकता की समुचित सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँगी।
जनसंख्या नीति के पालन को प्रोत्साहित करने के लिए न्यायसंगत एवं संविधानसम्मत प्रावधान निर्धारित किए जाएँगे। किसी भी परिस्थिति में बच्चों के मौलिक अधिकारों एवं निर्दोष आश्रितों के हितों का हनन नहीं होगा।
प्रत्येक नागरिक अपनी संतान के समुचित शारीरिक, मानसिक, शैक्षणिक, नैतिक एवं आत्मनिर्भर विकास के प्रति उत्तरदायी होगा।
राष्ट्रीय जनसंख्या नीति का निर्धारण एवं क्रियान्वयन करते समय जनसांख्यिकीय विविधता, क्षेत्रीय आवश्यकताओं, प्राकृतिक संसाधनों एवं भावी राष्ट्रीय हितों का विशेष ध्यान रखा जाएगा।
9. अंतिम निष्कर्ष
डॉ. शैलज जी, आपके मूल प्रारूप की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें जनसंख्या को केवल व्यक्तियों की संख्या नहीं, बल्कि राष्ट्र के सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक भविष्य से जोड़कर देखा गया है।
फिर भी एक महत्त्वपूर्ण वैचारिक अंतर स्पष्ट रखना चाहिए:
जनसंख्या नियंत्रण का उद्देश्य जन्मों की संख्या सीमित करना है।
जनसंख्या प्रबंधन का उद्देश्य जनसंख्या एवं संसाधनों में संतुलन स्थापित करना है।
जनसंख्या विकास का उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति को राष्ट्र की उत्पादक एवं सक्षम मानव शक्ति बनाना है।
मेरी राय में शैलज लोकतांत्रिक दल को केवल जनसंख्या नियंत्रण की नीति तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे 'संतुलित जनसंख्या, स्वस्थ परिवार एवं आत्मनिर्भर मानव संसाधन' के त्रिस्तरीय सिद्धांत पर विकसित करना अधिक दूरदर्शी होगा।
एक विशेष सुझाव: आपके मूल प्रारूप में 'आयुष्मान की सीमा' शब्दावली का अर्थ स्पष्ट नहीं हो रहा है। यदि इससे आपका आशय आयु-सीमा, प्रजनन योग्य आयु अथवा किसी अन्य पात्रता से है, तो उसे स्पष्ट करना आवश्यक है। कानूनी प्रारूप में अस्पष्ट शब्दावली नहीं रहनी चाहिए।
इस विषय को शैलज लोकतांत्रिक दल के संविधान में एक स्वतंत्र एवं विस्तृत अध्याय के रूप में स्थान देना उचित होगा।

डॉ. शैलज जी, आपने जनसंख्या नीति को पाँच बिंदुओं में सीमित करके इसकी मूल अवधारणा को स्पष्ट एवं व्यवस्थित रूप दिया है।
इस प्रारूप में पाँच प्रमुख आधार हैं—राष्ट्रीय हित, सामाजिक समानता, स्वैच्छिक परिवार नियोजन, राज्य का दायित्व तथा माता-पिता का उत्तरदायित्व।
मैंने आपके प्रारूप का सूक्ष्म भाषायी एवं वैचारिक परीक्षण किया है। कुछ छोटे संशोधनों के साथ इसे निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।
Writing
जनसंख्या नीति
राष्ट्रीय जनसंख्या नीति का मूल उद्देश्य संतुलित जनसंख्या वृद्धि, स्वस्थ परिवार, समुचित मानव संसाधन विकास तथा भावी पीढ़ियों की आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करना होगा।
राष्ट्र के सभी जाति, धर्म, वर्ग एवं क्षेत्र के नागरिकों के लिए समान जनसंख्या नीति का सिद्धांत स्वीकार किया जाएगा। परिवार नियोजन के अंतर्गत अधिकतम दो संतान के आदर्श को प्रोत्साहित किया जाएगा।
प्रत्येक नागरिक को अपने सामाजिक, सांस्कृतिक एवं पारिवारिक उत्तरदायित्वों के प्रति जागरूक करते हुए स्वैच्छिक एवं उत्तरदायी परिवार नियोजन के लिए प्रेरित किया जाएगा।
राज्य द्वारा परिवार नियोजन, मातृ स्वास्थ्य, शिशु स्वास्थ्य, महिला शिक्षा एवं जनसंख्या जागरूकता की समुचित सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाएँगी।
प्रत्येक माता-पिता अपनी संतान के समुचित शारीरिक, मानसिक, शैक्षणिक, नैतिक एवं आत्मनिर्भर विकास के प्रति उत्तरदायी होंगे।
तीन महत्त्वपूर्ण वैचारिक टिप्पणियाँ
1. समानता का सिद्धांत
जाति, धर्म, वर्ग एवं क्षेत्र के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए। हालाँकि, जनसांख्यिकीय परिस्थितियों के अनुसार क्षेत्रीय कार्यक्रमों में अंतर किया जा सकता है।
2. दो संतान का आदर्श
आपने 'प्रोत्साहित किया जाएगा' शब्दावली का प्रयोग किया है। इससे नीति का स्वरूप स्वैच्छिक एवं प्रेरणात्मक रहता है, न कि अनिवार्य अथवा दंडात्मक।
3. माता-पिता का उत्तरदायित्व
पाँचवें बिंदु में 'प्रत्येक नागरिक' के स्थान पर 'प्रत्येक माता-पिता' करना अधिक सटीक है। इससे उत्तरदायित्व का वास्तविक निर्धारण होता है।
एक संवैधानिक सुझाव
इस नीति के अंतर्गत यह स्पष्ट रहना चाहिए कि परिवार नियोजन के कारण किसी बच्चे को शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण अथवा अन्य मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जाएगा।
समग्रतः, आपके पाँच बिंदु जनसंख्या नियंत्रण, परिवार कल्याण और मानव संसाधन विकास को एक ही नीतिगत ढाँचे में प्रस्तुत करते हैं। इनकी संवैधानिक व्याख्या एवं क्रियान्वयन में स्वैच्छिकता, समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण आवश्यक होगा।

डॉ. शैलज जी, आपके मूल जनसंख्या नीति प्रारूप का पुनः परीक्षण करने पर मुझे एक पंक्ति स्पष्ट रूप से अनुपयुक्त तथा दो पंक्तियाँ संशोधन योग्य दिखाई देती हैं।
1. स्पष्ट रूप से अनुपयुक्त पंक्ति
जनसंख्या नियंत्रण नीति नहीं मानने वालों को आम लोगों को मिलने वाले सभी सरकारी लाभ से वंचित होना पड़ेगा।
अनुपयुक्तता के कारण:
यह प्रावधान नागरिकों के मौलिक अधिकारों एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता से टकराव उत्पन्न कर सकता है।
इससे परिवार के निर्दोष बच्चों को भी दंडात्मक प्रभाव झेलना पड़ सकता है।
गरीब एवं कमजोर वर्गों पर इसका असमान प्रभाव पड़ सकता है।
शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण एवं सामाजिक सुरक्षा जैसी आवश्यक सुविधाओं से वंचित करना न्यायसंगत नहीं होगा।
यह स्वैच्छिक परिवार नियोजन की अवधारणा के विपरीत दंडात्मक व्यवस्था स्थापित करता है।
मेरा सुझाव: इस पंक्ति को पूर्णतः हटाया जाना चाहिए।
2. संशोधन योग्य पंक्ति
राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक द्वारा अपने सामाजिक-सांस्कृतिक एवं धार्मिक अवधारणाओं के आलोक में अथवा स्वेच्छा से जनसंख्या विस्तार को नियंत्रित नहीं किये जाने पर उन्हें जनसंख्या विस्तार से होने वाले भावी राष्ट्रीय एवं नागरिक समस्याओं के लिये जिम्मेदार माना जायेगा।
इसमें व्यक्तिगत नागरिक को भविष्य की सामूहिक समस्याओं के लिए सीधे जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है।
इसके स्थान पर नागरिकों को जनसंख्या के प्रति जागरूक एवं उत्तरदायी बनाने की भाषा होनी चाहिए।
3. एक अन्य संशोधन योग्य पंक्ति
जनसंख्या नियंत्रण नीति सभी धर्म, वर्ग, जाति एवं क्षेत्र के लोगों पर लागू होगी।
इसका मूल भाव समानता है, लेकिन इसे इस प्रकार लिखना अधिक उपयुक्त होगा:
'राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के सिद्धांत सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होंगे।'
मेरा निष्कर्ष
आपके मूल प्रारूप में सबसे अधिक अनुपयुक्त पंक्ति सरकारी लाभों से वंचित करने वाली है।
जनसंख्या नीति का उद्देश्य नागरिकों को दंडित करना नहीं, बल्कि उत्तरदायी परिवार, स्वस्थ समाज एवं आत्मनिर्भर राष्ट्र का निर्माण करना होना चाहिए।
एक महत्त्वपूर्ण अंतर भी ध्यान देने योग्य है:
जनसंख्या नियंत्रण में दंडात्मक दृष्टिकोण के स्थान पर जनसंख्या प्रबंधन में जागरूकता, स्वैच्छिकता, प्रोत्साहन एवं नागरिक उत्तरदायित्व को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
Writing
जनसंख्या नियंत्रण नीति का अनुपालन नहीं करने वालों पर संविधानसम्मत सरकारी लाभ-पात्रता संबंधी प्रतिबंध लागू होंगे, किंतु मूलभूत सुविधाएँ एवं बच्चों के अधिकार अप्रभावित रहेंगे।
यह पंक्ति संक्षिप्त, स्पष्ट एवं दंडात्मक प्रावधान को संवैधानिक मर्यादा से जोड़ती है।

Writing
प्रत्येक नागरिक सामाजिक-सांस्कृतिक एवं धार्मिक मान्यताओं का सम्मान करते हुए स्वैच्छिक जनसंख्या नियंत्रण तथा उसके राष्ट्रीय एवं सामाजिक प्रभावों के प्रति उत्तरदायी होगा।
यहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सामाजिक उत्तरदायित्व एवं राष्ट्रहित—तीनों भाव समाहित हैं।

डॉ. शैलज जी, आपने जनसंख्या नीति के संदर्भ में दो महत्त्वपूर्ण सामाजिक एवं धार्मिक अवधारणाओं की ओर संकेत किया है—चार विवाह (चार बीबियाँ) तथा अल्लाह की मर्जी से संतान उत्पन्न होना। इनका धार्मिक, सामाजिक, जनसांख्यिकीय एवं संवैधानिक दृष्टिकोण से निष्पक्ष विश्लेषण आवश्यक है।
1. इस्लाम में चार विवाह की अवधारणा
इस्लाम में एक पुरुष को अधिकतम चार महिलाओं से विवाह करने की अनुमति का उल्लेख पवित्र कुरआन की सूरह अन-निसा (4:3) में मिलता है।
इस आयत का आशय है:
दो, तीन अथवा चार महिलाओं से विवाह की अनुमति।
सभी पत्नियों के साथ न्याय करने की शर्त।
यदि न्याय नहीं कर पाने की आशंका हो तो केवल एक विवाह करने का निर्देश।
इसलिए चार विवाह इस्लाम में अनिवार्य धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि निर्धारित शर्तों के अधीन अनुमत व्यवस्था है। �
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चार विवाह और संतानोत्पत्ति
यहाँ दो अलग-अलग विषय समझना आवश्यक है।
चार विवाह की अनुमति।
प्रत्येक विवाह से संतान उत्पन्न करने की अनिवार्यता।
इस्लाम में चार विवाह की अनुमति का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक पत्नी से संतान उत्पन्न करना अनिवार्य है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी जावेद बनाम हरियाणा राज्य (2003) में स्पष्ट किया था कि इस्लाम चार विवाह की अनुमति देता है, लेकिन चार विवाह करना अथवा प्रत्येक पत्नी से संतान उत्पन्न करना धार्मिक अनिवार्यता नहीं है। �
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2. अल्लाह की मर्जी से संतान की अवधारणा
इस्लामी धार्मिक मान्यता के अनुसार संतान का जन्म अल्लाह की इच्छा एवं कृपा से होता है।
इस मान्यता में निम्नलिखित भाव निहित हैं:
संतान को ईश्वर का उपहार माना जाता है।
संतान का जन्म मनुष्य के पूर्ण नियंत्रण में नहीं माना जाता।
संतान के पालन-पोषण एवं अधिकारों की रक्षा माता-पिता का दायित्व है।
लेकिन धार्मिक आस्था और व्यावहारिक परिवार नियोजन दो अलग विषय हैं। इस्लामी धार्मिक साहित्य में भी परिवार नियोजन एवं गर्भनिरोध के विषय पर विभिन्न विद्वानों की व्याख्याएँ मिलती हैं।
इसलिए यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि अल्लाह की मर्जी की मान्यता का अर्थ परिवार नियोजन का निषेध है।
3. जनसंख्या नीति के दृष्टिकोण से विश्लेषण
आपकी प्रस्तावित नीति में अधिकतम दो संतान के आदर्श को सभी नागरिकों के लिए प्रोत्साहित करने की बात है।
इस संदर्भ में तीन प्रश्न महत्त्वपूर्ण हैं:
विषय
विचारणीय प्रश्न
बहुविवाह
क्या विवाहों की संख्या जनसंख्या नीति के निर्धारण का आधार होनी चाहिए?
संतानोत्पत्ति
क्या सभी नागरिकों के लिए समान परिवार नियोजन का सिद्धांत लागू होना चाहिए?
धार्मिक स्वतंत्रता
क्या धार्मिक मान्यताओं के सम्मान के साथ स्वैच्छिक परिवार नियोजन संभव है?
मेरी दृष्टि में जनसंख्या नीति में विवाहों की संख्या के बजाय संतान की संख्या, परिवार की आर्थिक क्षमता, मातृ स्वास्थ्य, बाल विकास तथा राष्ट्रीय संसाधनों को प्रमुख आधार बनाना चाहिए।
4. भारतीय संविधान के संदर्भ में
अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार प्रदान करता है तथा अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जो सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन है।
अतः धार्मिक स्वतंत्रता और समान नागरिक नीति के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है।
सर्वोच्च न्यायालय ने जावेद बनाम हरियाणा राज्य (2003) में यह भी स्पष्ट किया कि धार्मिक रूप से अनुमत बहुविवाह अथवा एक से अधिक संतान उत्पन्न करना अपने-आप में अनिवार्य धार्मिक कर्तव्य नहीं बन जाता। �
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5. शैलज जनसंख्या नीति के लिए एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत
मेरे विचार से इस विषय को आपकी जनसंख्या नीति में निम्नलिखित एक पंक्ति के माध्यम से समाहित किया जा सकता है:
प्रस्तावित सिद्धांत:
Writing
धार्मिक मान्यताओं एवं वैवाहिक प्रथाओं से निरपेक्ष, सभी नागरिकों के लिए समान, स्वैच्छिक एवं उत्तरदायी परिवार नियोजन का सिद्धांत लागू होगा।
अंतिम विचार
डॉ. शैलज जी, यहाँ एक मौलिक अंतर समझना आवश्यक है:
धर्म व्यक्ति की आस्था का विषय है, जबकि जनसंख्या प्रबंधन राष्ट्र के सामाजिक, आर्थिक एवं मानवीय संसाधनों से संबंधित विषय है।
दोनों के बीच समन्वय स्थापित करते हुए किसी भी धर्म, समुदाय अथवा वर्ग के प्रति भेदभाव किए बिना समान नागरिक उत्तरदायित्व निर्धारित करना ही इस नीति का संवैधानिक एवं सामाजिक आधार होना चाहिए।


डॉ. शैलज जी, आपने जनसंख्या नीति के संदर्भ में दो महत्त्वपूर्ण सामाजिक एवं धार्मिक अवधारणाओं की ओर संकेत किया है—चार विवाह (चार बीबियाँ) तथा अल्लाह की मर्जी से संतान उत्पन्न होना। इनका धार्मिक, सामाजिक, जनसांख्यिकीय एवं संवैधानिक दृष्टिकोण से निष्पक्ष विश्लेषण आवश्यक है।
1. इस्लाम में चार विवाह की अवधारणा
इस्लाम में एक पुरुष को अधिकतम चार महिलाओं से विवाह करने की अनुमति का उल्लेख पवित्र कुरआन की सूरह अन-निसा (4:3) में मिलता है।
इस आयत का आशय है:
दो, तीन अथवा चार महिलाओं से विवाह की अनुमति।
सभी पत्नियों के साथ न्याय करने की शर्त।
यदि न्याय नहीं कर पाने की आशंका हो तो केवल एक विवाह करने का निर्देश।
इसलिए चार विवाह इस्लाम में अनिवार्य धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि निर्धारित शर्तों के अधीन अनुमत व्यवस्था है। �
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चार विवाह और संतानोत्पत्ति
यहाँ दो अलग-अलग विषय समझना आवश्यक है।
चार विवाह की अनुमति।
प्रत्येक विवाह से संतान उत्पन्न करने की अनिवार्यता।
इस्लाम में चार विवाह की अनुमति का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक पत्नी से संतान उत्पन्न करना अनिवार्य है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी जावेद बनाम हरियाणा राज्य (2003) में स्पष्ट किया था कि इस्लाम चार विवाह की अनुमति देता है, लेकिन चार विवाह करना अथवा प्रत्येक पत्नी से संतान उत्पन्न करना धार्मिक अनिवार्यता नहीं है। �
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2. अल्लाह की मर्जी से संतान की अवधारणा
इस्लामी धार्मिक मान्यता के अनुसार संतान का जन्म अल्लाह की इच्छा एवं कृपा से होता है।
इस मान्यता में निम्नलिखित भाव निहित हैं:
संतान को ईश्वर का उपहार माना जाता है।
संतान का जन्म मनुष्य के पूर्ण नियंत्रण में नहीं माना जाता।
संतान के पालन-पोषण एवं अधिकारों की रक्षा माता-पिता का दायित्व है।
लेकिन धार्मिक आस्था और व्यावहारिक परिवार नियोजन दो अलग विषय हैं। इस्लामी धार्मिक साहित्य में भी परिवार नियोजन एवं गर्भनिरोध के विषय पर विभिन्न विद्वानों की व्याख्याएँ मिलती हैं।
इसलिए यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि अल्लाह की मर्जी की मान्यता का अर्थ परिवार नियोजन का निषेध है।
3. जनसंख्या नीति के दृष्टिकोण से विश्लेषण
आपकी प्रस्तावित नीति में अधिकतम दो संतान के आदर्श को सभी नागरिकों के लिए प्रोत्साहित करने की बात है।
इस संदर्भ में तीन प्रश्न महत्त्वपूर्ण हैं:
विषय
विचारणीय प्रश्न
बहुविवाह
क्या विवाहों की संख्या जनसंख्या नीति के निर्धारण का आधार होनी चाहिए?
संतानोत्पत्ति
क्या सभी नागरिकों के लिए समान परिवार नियोजन का सिद्धांत लागू होना चाहिए?
धार्मिक स्वतंत्रता
क्या धार्मिक मान्यताओं के सम्मान के साथ स्वैच्छिक परिवार नियोजन संभव है?
मेरी दृष्टि में जनसंख्या नीति में विवाहों की संख्या के बजाय संतान की संख्या, परिवार की आर्थिक क्षमता, मातृ स्वास्थ्य, बाल विकास तथा राष्ट्रीय संसाधनों को प्रमुख आधार बनाना चाहिए।
4. भारतीय संविधान के संदर्भ में
अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार प्रदान करता है तथा अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है, जो सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन है।
अतः धार्मिक स्वतंत्रता और समान नागरिक नीति के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है।
सर्वोच्च न्यायालय ने जावेद बनाम हरियाणा राज्य (2003) में यह भी स्पष्ट किया कि धार्मिक रूप से अनुमत बहुविवाह अथवा एक से अधिक संतान उत्पन्न करना अपने-आप में अनिवार्य धार्मिक कर्तव्य नहीं बन जाता। �
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5. शैलज जनसंख्या नीति के लिए एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत
मेरे विचार से इस विषय को आपकी जनसंख्या नीति में निम्नलिखित एक पंक्ति के माध्यम से समाहित किया जा सकता है:
प्रस्तावित सिद्धांत:
Writing
धार्मिक मान्यताओं एवं वैवाहिक प्रथाओं से निरपेक्ष, सभी नागरिकों के लिए समान, स्वैच्छिक एवं उत्तरदायी परिवार नियोजन का सिद्धांत लागू होगा।
अंतिम विचार
डॉ. शैलज जी, यहाँ एक मौलिक अंतर समझना आवश्यक है:
धर्म व्यक्ति की आस्था का विषय है, जबकि जनसंख्या प्रबंधन राष्ट्र के सामाजिक, आर्थिक एवं मानवीय संसाधनों से संबंधित विषय है।
दोनों के बीच समन्वय स्थापित करते हुए किसी भी धर्म, समुदाय अथवा वर्ग के प्रति भेदभाव किए बिना समान नागरिक उत्तरदायित्व निर्धारित करना ही इस नीति का संवैधानिक एवं सामाजिक आधार होना चाहिए।

गरीबी के नाम पर मिलने वाली सरकारी सुविधाओं से जनसंख्या नियंत्रण बाधित होता है और सत्तारूढ दल का वोट बैंक बढता है।


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