सोमवार, 29 दिसंबर 2025

' सर्व कल्याणकारी प्रार्थना ' सार

' सर्व कल्याणकारी प्रार्थना '
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प्रियतम! स्वामी ! सुन्दरतम्! माधव ! हे सखा ! हमारे !
मिलती है , शान्ति -👌जगत में, केवल प्रभु ! तेरे सहारे ।।१।।
तुम अमल धवल ज्योति हो, ज्योतित करते हो- जग को ।
स्रष्टा ! पालक ! संहर्ता ! तुम एक नियन्ता -जग के ।।२।।
कैसे मैं तुझे पुकारूँ , जड़ हूँ, न ज्ञान -मुझको है ।
प्रभु एक सहारा -तुम हो, रखनी प्रभु लाज -तुझे है ।।३।।
सर्वग्य! सम्प्रभु! माधव! तुम तो -त्रिकाल दर्शी हो ।
अन्तर्यामी ! जगदीश्वर ! तम-हर ! भास्कर भास्कर हो ।।४।।
मायापति ! जन सुख दायक ! तुम व्याप्त-चराचर में हो ।
हे अगुण ! सगुण ! परमेश्वर ! सर्वस्व हमारे -तुम हो ।।५।।
आनन्दकन्द ! करूणाकर ! शशि-सूर्य नेत्र हैं -तेरे ।
तुम बसो अहर्निश प्रतिपल, प्रभु ! अभ्यन्तर में -मेरे ।।६।।
तेरी ही दया कृपा से, अन्न धन सर्वस्व मिला है ।
तेरी ममता इच्छा से, यह जीवन कमल खिला है ।।७।।
उपहास किया करते हैं, जग के प्राणी सब -मेरे ।
स्वीकार उन्हें करता हूँ, प्रेरणा मान सब -तेरे ।।८।।
कर्त्तव्य किया न कभी मैं, प्रभु ! प्रबल पाप धोने का ।
जुट पाता नहीं मनोबल, प्रभु ! अहंकार खोने का ।।९।।
बस, तिरस्कार पाता हूँ, यह पुरस्कार है- जग का ।
है बोध न मुझको कुछ भी, जगती का और नियति का ।।१०।।
यह जीवन चले शतायु, मंगलमय हो जग सारा ।
माधव ! चरणों में तेरे, जीवन अर्पित हो सारा ।।११।।
हे हरि ! दयानिधि ! दिनकर ! सब जग के तुम्हीं -सहारे ।
हम सब को प्रेम सिखाओ, हे प्रेमी परम हमारे ।।१२।।
हो बोध हमें जीवन का, कर्त्तव्य बोध हो सारा ।
अनुकरण योग्य प्रति पल हो, जीवन आदर्श हमारा ।।१३।।
ईर्ष्या, माया, मत्सर का लव लेश नहीं हो हममें ।
धन, बल, विकास, काया का -सुन्दर विकास हो हममें ।।१४।।
सौहार्द, प्रेम भावों का प्रभु ! उत्स हृदय में फूटे ।
उत्तम् विचार राशि को, जगती जी भर कर लूटे ।।१५।।
सार्थक हो जग में जीवन, सार्थक हो प्रेम हमारा ।
माधव ! चरणों में तेरे, जीवन अर्पित हो सारा ।।१६।।

:- प्रो० अवधेश कुमार 'शैलज', पचम्बा, बेगूसराय ।
(सेवा निवृत्त प्राचार्य सह विभागाध्यक्ष मनोविज्ञान, एम.जे.जे.कालेज,एम.,बनवारीपुर,बेगूसराय।
(कालेज कोड : ८४०१४)

यह 'सर्व कल्याणकारी प्रार्थना' प्रो. अवधेश कुमार 'शैलज' द्वारा रचित एक अत्यंत हृदयस्पर्शी, दार्शनिक, और भक्ति रस से परिपूर्ण कविता है। इसमें एक साधक की पूर्ण समर्पण-भावना, आत्मविनय, और विश्वहित की प्रार्थना झलकती है।
प्रमुख विशेषताएँ:
भक्ति और समर्पण का भाव:
"माधव ! चरणों में तेरे, जीवन अर्पित हो सारा" — यह अंतिम चरणों की पुनरावृत्ति पूर्ण समर्पण का सूचक है।
दार्शनिक गहराई:
"हे अगुण ! सगुण ! परमेश्वर ! सर्वस्व हमारे -तुम हो" — निर्गुण-सगुण के समन्वय की वेदान्तीय व्याख्या।
मानव दुर्बलताओं की स्वीकृति:
"जुट पाता नहीं मनोबल, प्रभु ! अहंकार खोने का" — यह आत्मनिरीक्षण की उत्कृष्ट मिसाल है।
समाज और जीवन की व्यापक चिंता:
"हो बोध हमें जीवन का, कर्त्तव्य बोध हो सारा" — व्यक्ति से समाज तक का विस्तार।
काव्य सौंदर्य:
सहज शब्दावली, अनुप्रास, पुनरुक्ति अलंकार, और मधुर लयबद्धता।
यह रचना न केवल एक प्रार्थना है, अपितु एक आदर्श जीवन-दर्शन, नैतिक चेतना, और मानव-मूल्य आधारित समाज की कल्पना भी है।
यदि आप चाहें, तो मैं इसका अंग्रेज़ी अनुवाद, टीका-टिप्पणी सहित भावार्थ, या प्रकाशन योग्य स्वरूप तैयार कर सकता हूँ।

हाँ

धन्यवाद। मैं इस 'सर्व कल्याणकारी प्रार्थना' का तीन भागों में क्रमशः रूपांतरण प्रस्तुत करता हूँ:
1. अंग्रेज़ी अनुवाद (English Translation)
Universal Benevolent Prayer
By Prof. Awadhesh Kumar 'Shailaj'

Beloved! Lord! Most Beautiful! O Madhava, our dearest friend!
Only by Your shelter, O Lord, does peace descend in this world.

You are the pure, immaculate light — illuminating the entire universe.
Creator, Sustainer, Destroyer — You alone are the Supreme Ruler of all.

How can I call upon You, O Lord? I am inert, devoid of true knowledge.
You alone are my only refuge; it is You who must uphold my honor.

All-knowing, All-powerful Madhava! You perceive all three times — past, present, future.
The Inner Witness, Lord of the Universe, Dispeller of darkness — the Radiant Sun of Suns!

Master of Maya, Giver of joy — You pervade all creation.
O Formless and Formed Supreme Lord — You are our all-in-all.

Fountain of Bliss, Compassionate One — the moon and sun are Your eyes.
Abide in me, O Lord, every moment, day and night — within my very being.

By Your grace and mercy alone have I received food, wealth, and all that I possess.
By Your love and will, this lotus of life has blossomed.

The creatures of the world mock me,
Yet I accept them all as Your divine inspirations.

Never have I fulfilled my duties or washed away my grave sins.
I lack the inner strength, O Lord, to dissolve my ego.

I only earn scorn — this is the world's reward.
I understand nothing — neither of this world nor of fate.

May this life extend a hundred years; may the whole world be blessed.
O Madhava! Let my entire life be surrendered at Your feet.

O Hari! Ocean of Compassion! Sun of all beings — You are our only support.
Teach us all to love, O Supreme Lover of All.

May we gain insight into life, and fully awaken to our duties.
May our every moment be worthy of emulation — a model life for others.

Let there not be a trace of envy, illusion, or jealousy within us.
May strength, health, wealth, and growth blossom beautifully in us.

Let the fountain of harmony and love burst forth in our hearts.
May the world eagerly bathe in the treasure of noble thoughts.

May life be meaningful in this world, may our love be true.
O Madhava! Let our entire life be surrendered at Your feet.
2. भावार्थ व टीका (भावनात्मक-दार्शनिक टिप्पणी)
(यदि आप चाहें तो मैं यह भाग प्रत्येक श्लोक पर अलग से, क्रमशः विस्तारपूर्वक दे सकता हूँ — जैसे भक्ति, वेदांत, मनोविज्ञान और सामाजिक दृष्टिकोण से।)
3. प्रकाशन योग्य स्वरूप
मैं आपको एक प्रकाशन योग्य दो-भाषीय PDF दस्तावेज़ तैयार कर सकता हूँ, जिसमें निम्न संरचना होगी:
शीर्षक पृष्ठ (शीर्षक, लेखक परिचय, तिथि, स्थान)
हिंदी मूल पाठ (शुद्ध और सौंदर्यपूर्ण देवनागरी में)
अंग्रेज़ी अनुवाद (समांतर पंक्तियों में)
भावार्थ / टीका (यदि आप चाहें तो)
लेखक परिचय एवं संदर्भ
क्या आप इस PDF के लिए यह स्वरूप चाहेंगे?
और क्या आप टीका व भावार्थ भी सम्मिलित करना चाहेंगे?
यदि हाँ, तो कृपया बताएं कि टीका किस शैली में हो — भक्ति, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक या समन्वयात्मक?
मैं उसी अनुरूप आगे बढ़ाऊँगा।

हाँ
बहुत अच्छा। अब मैं "सर्व कल्याणकारी प्रार्थना" का प्रकाशन योग्य द्विभाषीय (हिंदी-अंग्रेज़ी) PDF दस्तावेज़ तैयार करने की प्रक्रिया प्रारंभ करता हूँ। इसमें शामिल होंगे:
शीर्षक पृष्ठ
मूल हिंदी प्रार्थना (शुद्ध देवनागरी में)
अंग्रेज़ी अनुवाद (समांतर शैली में)
भावार्थ और टिप्पणी – भक्ति, दर्शन, और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोणों का समन्वय
लेखक परिचय और संदर्भ
अगले चरण के लिए आपसे निवेदन:
क्या आप कोई समर्पण (Dedication) या प्रस्तावना (Preface) जोड़ना चाहेंगे?
लेखक परिचय के लिए क्या उपरोक्त विवरण (नाम, पद, स्थान) पर्याप्त है या आप कुछ और जोड़ना चाहेंगे (जैसे प्रकाशन वर्ष, प्रेरणा आदि)?
क्या दस्तावेज़ में कोई चित्र या प्रतीक (जैसे ओम्, श्रीराम, सूर्य) सम्मिलित करना चाहेंगे?
आपकी पुष्टि मिलते ही मैं प्रारूप बनाना शुरू करूँगा और फिर PDF का पहला ड्राफ्ट साझा करूँगा।

संस्कृत भाषा में प्रस्तुत करें

बहुत उत्तम। अब मैं 'सर्व कल्याणकारी प्रार्थना' का संस्कृत अनुवाद, भावार्थ की शैली में, भक्ति-दार्शनिक-मनोवैज्ञानिक समन्वय के साथ प्रस्तुत करूँगा।
१. शीर्षक:
सर्वकल्याणकारी प्रार्थना
(लेखकः प्रो. अवधेशकुमारः ‘शैलज’)
२. संस्कृतानुवादः
(प्रत्येक श्लोक का शुद्ध संस्कृत रूपांतर)
१.
प्रियतम! स्वामिन्! सुन्दरतम! माधव! हे सखा मम!
त्वमेव जगति शान्तेः कारणं—प्रभो! केवलं शरणं मम।।
२.
त्वम् अमलः धवलः ज्योतिः, यः प्रकाशयति जगत्सर्वम्।
स्रष्टा, पालकः, संहर्ता च—त्वमेव एकः नियन्ता।।
३.
कथं तव आह्वानं कुर्याम्? जडोऽहम्, ज्ञानं मम नास्ति।
एकं तव आश्रयं मम, रक्ष त्वं लज्जां निजां प्रभो।।
४.
सर्वज्ञ! सर्वशक्तिमन्! त्रिकालदर्शिन् माधव!
अन्तर्यामी! जगन्नाथ! तमोहर! भास्करः चासि।।
५.
मायापते! सुखदायक! व्याप्तः त्वं चराचरे।
निर्गुणः सगुणः च त्वं, परमेश्वरः सर्वस्वं मम।।
६.
आनन्दकन्द! करुणाकर! शशिसूर्यौ तव नेत्रे।
प्रत्यहम्, प्रतिक्षणं, अहर्निशं, वस मम अन्तरे प्रभो।।
७.
तव कृपया दया च एव अन्नं धनं च प्राप्तं मया।
तव मातृत्वेन इच्छया, जीवनं खलु विकसति।।
८.
उपहसन्ति मां सर्वे, लोकस्य प्राणिनः।
तान् स्वीकरोम्यहम् प्रभो, प्रेरणां ते मानयामि।।
९.
कर्तव्यं न कृतं मया, पापं च नाशितुं न शक्यम्।
न मनोबलं समारभे, न अहंकारं त्यक्तुं प्रभो।।
१०.
तिरस्कारमेव लभे, एष लोकस्य पुरस्कारः।
न मे बोधः अस्ति कश्चन, न संसारस्य न च नियतेः।।
११.
शतवर्षं जीवितं स्यात्, शुभं च जगत्सर्वम्।
माधव! तव पादयोः सदा, समर्पितं जीवनं मम।।
१२.
हे हरिः! दयानिधे! दिनकर! त्वमेव जगतः आधारः।
प्रेमं नो शिक्षयतु प्रभो, त्वं परमप्रेमस्वरूपः।।
१३.
जीवनस्य बोधो यः स्यात्, कर्तव्यबोधः अपि सर्वदा।
जीवनं यत् अनुकरणीयं, आदर्शरूपं सदा भवेत्।।
१४.
ईर्ष्यामायामत्सरयोः लेशोऽपि नो अस्तु मयि।
धनबलकायविकासः च, सम्यग्विकसितो भवतु मयि।।
१५.
सौहार्दं प्रेमभावाश्च, प्रभो! उत्पतन्तु हृदि मम।
उत्तमान् विचारान् लोकोऽयं, हर्षेण स्वीकरोतु।।
१६.
सार्थकं जीवनं लोके, सार्थकं प्रेमसंयुतम्।
माधव! तव पादयोः सदा, समर्पितं जीवनं मम।।
यदि आप चाहें तो मैं इसके साथ अंग्रेज़ी अनुवाद, हिंदी मूल और टीका सहित PDF प्रारूप अगली चरण में आरंभ कर दूँ?
क्या आप इस संस्कृत अनुवाद को इसी रूप में सुरक्षित रखना चाहेंगे, या इसमें और refinement (शुद्धता/अलंकारिकता) चाहेंगे?
आपके निर्देशानुसार अगला चरण शुरू करूँगा।



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