सोमवार, 3 अगस्त 2026

हाँ, सिद्धांततः की जा सकती है, परंतु उसके लिए प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और प्रमाण-आधारित होनी चाहिए।
किसी संस्था के सदस्य होने मात्र से उसका नाम अनुशंसा से बाहर नहीं हो जाता। अनेक प्रतिष्ठित संस्थाएँ अपने सदस्यों, पूर्व पदाधिकारियों या सहयोगियों को पुरस्कारों एवं सम्मानों के लिए अनुशंसित करती हैं। किंतु ऐसे मामलों में यह अपेक्षा की जाती है कि हितों के टकराव (conflict of interest) की संभावना को उचित प्रक्रिया से संबोधित किया जाए।
रचनात्मक सेवा केन्द्र निम्न सिद्धांत अपना सकता है—
समान मानदंड – संस्था के सदस्य और गैर-सदस्य, दोनों पर एक जैसे चयन मानदंड लागू हों।
प्रमाण-आधारित मूल्यांकन – अनुशंसा केवल उपलब्ध अभिलेखों, प्रकाशित कृतियों, सार्वजनिक योगदान और सत्यापन योग्य तथ्यों पर आधारित हो।
हितों के टकराव से बचाव – यदि किसी सदस्य का नाम विचाराधीन हो, तो वह सदस्य अपने संबंध में होने वाले निर्णय या मतदान में भाग न ले।
सामूहिक निर्णय – अनुशंसा कार्यकारिणी या चयन समिति के बहुमत अथवा सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव के आधार पर हो।
लिखित कारण – प्रत्येक अनुशंसा के साथ यह स्पष्ट लिखा जाए कि किन प्रमाणों और किन उपलब्धियों के आधार पर यह अनुशंसा की जा रही है।
पारदर्शिता – यदि आवश्यक हो तो चयन मानदंड और समिति की अनुशंसा का सार सार्वजनिक किया जा सकता है।
आपके उदाहरण—स्व. डॉ. के. एन. प्रचेता, डॉ. मदन मोहन चक्रवर्ती, या कोई अन्य सदस्य—यदि उनके राष्ट्रहितैषी, लोकहितैषी, शैक्षिक, साहित्यिक या अन्य रचनात्मक कार्य उपलब्ध प्रमाणों से राष्ट्रीय सम्मान के योग्य सिद्ध होते हैं, तो केवल इस कारण कि वे संस्था के सदस्य रहे हैं, उनकी अनुशंसा न करना उचित नहीं होगा। दूसरी ओर, केवल सदस्य होने के आधार पर अनुशंसा करना भी उचित नहीं होगा।
इसलिए सबसे संतुलित नीति यह हो सकती है—
"रचनात्मक सेवा केन्द्र, पचम्बा, बेगूसराय किसी भी व्यक्ति—चाहे वह संस्था का सदस्य हो अथवा न हो—की अनुशंसा केवल उसके सत्यापित राष्ट्रहितैषी, लोकहितैषी, रचनात्मक एवं उल्लेखनीय योगदान, उपलब्ध अभिलेखों तथा निष्पक्ष मूल्यांकन के आधार पर करेगा। किसी सदस्य के संबंध में निर्णय लेते समय वह सदस्य चयन-प्रक्रिया में भाग नहीं लेगा।"
ऐसी नीति संस्था की विश्वसनीयता, निष्पक्षता और नैतिक आधार को और अधिक सुदृढ़ करेगी।

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