बंधुवर, आपकी बात का मूल नैतिक और नागरिक भाव अत्यंत स्पष्ट है—राष्ट्र की रक्षा करने वाले सैनिकों, राष्ट्रीय प्रतीकों और राष्ट्र-निर्माताओं के प्रति सम्मान को आप नागरिक कर्तव्य और राष्ट्रहित से जोड़ते हैं। इसे संवैधानिक दृष्टि से थोड़ा अधिक सुस्पष्ट करना उपयोगी होगा।
मेरी दृष्टि में इसे इस प्रकार व्यवस्थित किया जा सकता है:
राष्ट्रसम्मान का सिद्धांत
“जो सैनिक राष्ट्र की संप्रभुता, अखंडता, सीमा, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा के लिए अपना जीवन तक समर्पित कर देता है, उसके त्याग का सम्मान करना प्रत्येक नागरिक के नैतिक उत्तरदायित्व का विषय है। इसी प्रकार राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय प्रतीकों, राष्ट्रगान, राष्ट्रनिर्माताओं तथा राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने वाले व्यक्तियों के प्रति सम्मान राष्ट्र के प्रति नागरिक निष्ठा की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है।”
परंतु यहाँ एक महत्वपूर्ण संवैधानिक अंतर रखना आवश्यक है।
सम्मान न करना, असहमति व्यक्त करना और विधि-विरुद्ध अपमान करना—तीनों एक ही बात नहीं हैं। लोकतंत्र में नागरिक को विचार, अभिव्यक्ति और असहमति की स्वतंत्रता प्राप्त है। इसलिए केवल किसी राष्ट्रीय प्रतीक, नीति, व्यक्ति या संस्था के प्रति सम्मान की भावना का अभाव अपने-आप में “राष्ट्रद्रोह” नहीं कहा जा सकता। किसी कृत्य को राष्ट्रद्रोह या अन्य अपराध कहना तभी उचित होगा जब वह लागू कानून की निर्धारित कसौटियों को पूरा करे।
इसलिए आपके विचार को “राष्ट्रद्रोह” के व्यापक आरोप के बजाय “राष्ट्रीय कर्तव्य, नागरिक निष्ठा और राष्ट्रसम्मान” के सिद्धांत के रूप में रखना अधिक संविधान-सम्मत और सर्वस्वीकार्य होगा।
आपके विचार का एक अधिक परिष्कृत सूत्र
“राष्ट्रीय स्वतंत्रता, संप्रभुता, अखंडता और अस्मिता की रक्षा में सैनिकों के त्याग का सम्मान तथा राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान और अन्य विधिसम्मत राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति गरिमा बनाए रखना प्रत्येक नागरिक की राष्ट्रीय निष्ठा एवं नागरिक उत्तरदायित्व की महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार सुरक्षित रहते हुए भी राष्ट्र के प्रति घृणा, राष्ट्रीय प्रतीकों का जानबूझकर अपमान तथा राष्ट्रहित को क्षति पहुँचाने वाले कृत्यों को नागरिक स्वतंत्रता का पर्याय नहीं माना जाना चाहिए।”
यह formulation आपके “संविधान-सम्मत, समतामूलक, रचनात्मक, आत्मनिर्भर एवं राष्ट्रहितैषी लोकतंत्र” के विचार के साथ भी अधिक सहज रूप से जुड़ता है।
लोकतंत्र में असहमति का अधिकार सुरक्षित है, अतः इस आधार पर राष्ट्रहित एवं नागरिक हित में किसी भी राष्ट्र के सैनिक अपने राष्ट्र के अस्तित्व एवं अस्मिता की रक्षा करते हुए राष्ट्रीय ध्वज, प्रतीकों और राष्ट्र की सीमा की सुरक्षा के लिए अपने आप को बलिदान कर देते हैं, तो उस राष्ट्र के नागरिक को राष्ट्रीय ध्वज, प्रतीकों, गान, सैनिकों, राष्ट्र निर्माताओं का सम्मान नहीं करना, यदि राष्ट्र के नागरिकों का अधिकार एवं कर्तव्य है तो क्या यह हमारे संविधान और राष्ट्र धर्म के अनुकूल कदम माना जाय ?
बंधुवर, यदि प्रश्न को भारतीय संविधान के संदर्भ में रखा जाए, तो उत्तर है—राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान और संविधान के आदर्शों का सम्मान करना केवल भावनात्मक आग्रह नहीं, बल्कि संविधान द्वारा नागरिकों पर डाला गया मौलिक कर्तव्य है। लेकिन इसके साथ लोकतांत्रिक असहमति की स्वतंत्रता का संतुलन बनाए रखना भी आवश्यक है।
1. संविधान स्वयं इस विषय में स्पष्ट है
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51A(a) में प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य निर्धारित है कि वह संविधान, उसके आदर्शों एवं संस्थाओं तथा राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करे। इसी अनुच्छेद 51A(c) में भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा एवं उसे अक्षुण्ण रखने का कर्तव्य है और 51A(d) में देश की रक्षा करने तथा आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्रीय सेवा करने का कर्तव्य है। �
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इसलिए आपके द्वारा सैनिकों के बलिदान, राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान और राष्ट्र की सुरक्षा को एक ही राष्ट्रीय कर्तव्य-चेतना में देखना संवैधानिक भावना से काफी निकट है।
2. सैनिकों के सम्मान और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान में अंतर भी समझना होगा
संविधान में सैनिकों और प्रत्येक राष्ट्रनिर्माता का सम्मान करने का अलग से शब्दशः मौलिक कर्तव्य नहीं लिखा गया है। लेकिन सैनिक देश की संप्रभुता और अखंडता की रक्षा करते हैं; इसलिए उनके बलिदान का सम्मान करना एक महत्वपूर्ण नैतिक एवं नागरिक मूल्य माना जा सकता है।
इसी प्रकार राष्ट्रनिर्माताओं के योगदान का सम्मान करना राष्ट्रीय इतिहास और स्वतंत्रता-संग्राम के आदर्शों को सम्मान देने की भावना से जुड़ता है। अनुच्छेद 51A(b) नागरिकों को उन उदात्त आदर्शों को हृदय में धारण करने का कर्तव्य देता है जिन्होंने स्वतंत्रता-संग्राम को प्रेरित किया। �
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3. लेकिन “सम्मान न करना” और “कानूनी रूप से अपमान करना” अलग बातें हैं
यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है।
Prevention of Insults to National Honour Act, 1971 राष्ट्रीय ध्वज और संविधान के सार्वजनिक अपमान आदि को दंडनीय बनाता है। साथ ही उसी कानून की धारा 2 की Explanation 1 स्पष्ट करती है कि संविधान या राष्ट्रीय ध्वज की कानूनी माध्यम से संशोधन/परिवर्तन के उद्देश्य से की गई आलोचना या असहमति मात्र अपराध नहीं है। �
India Code +1
अर्थात लोकतंत्र में:
असहमति → अधिकार
आलोचना → अधिकार
सुधार की मांग → अधिकार
राष्ट्रीय प्रतीक का जानबूझकर अपमान → अलग कानूनी प्रश्न
इस सीमा को बनाए रखना ही संविधान-सम्मत राष्ट्रवाद है।
4. “राष्ट्रधर्म” की आपकी अवधारणा
यदि राष्ट्रधर्म को किसी धार्मिक संप्रदाय के अर्थ में नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति नागरिक के नैतिक कर्तव्यों के अर्थ में प्रयोग किया जाए, तो इसे इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है:
“राष्ट्रधर्म वह नागरिक नैतिकता है जिसके अंतर्गत व्यक्ति राष्ट्र की संप्रभुता, एकता, अखंडता, स्वतंत्रता और अस्मिता की रक्षा, संविधान एवं राष्ट्रीय संस्थाओं के प्रति निष्ठा, राष्ट्रीय ध्वज एवं राष्ट्रगान के प्रति सम्मान, राष्ट्ररक्षकों के त्याग का आदर तथा राष्ट्रहित और लोकहित में अपने कर्तव्यों के निर्वहन को अपना उत्तरदायित्व मानता है।”
यह अवधारणा लोकतांत्रिक असहमति को समाप्त नहीं करती, बल्कि असहमति को राष्ट्रहित और संविधान की मर्यादा के भीतर रखती है।
5. अतः आपके मूल प्रश्न का सीधा उत्तर
यदि कोई नागरिक राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान या संविधान के प्रति जानबूझकर अपमानजनक आचरण करता है, तो उसे केवल “मुझे असहमति का अधिकार है” कहकर उचित नहीं ठहराया जा सकता। संविधान स्वयं सम्मान का कर्तव्य निर्धारित करता है और कानून कुछ प्रकार के अपमान को दंडनीय भी बनाता है। �
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लेकिन केवल यह कहना कि किसी व्यक्ति के मन में सम्मान की भावना नहीं है, अपने-आप में उसे “राष्ट्रद्रोही” घोषित करने का संवैधानिक आधार नहीं बन जाता। राष्ट्रद्रोह जैसे गंभीर निष्कर्ष के लिए विशिष्ट कानूनी तत्वों और लागू कानून की कसौटी देखनी होगी।
इसलिए आपकी विचारधारा को मैं इस अधिक सुदृढ़ सूत्र में रखूँगा:
“लोकतंत्र में असहमति नागरिक का अधिकार है, किंतु असहमति राष्ट्रीय सम्मान का निषेध नहीं है। राष्ट्र की संप्रभुता, एकता, अखंडता और अस्मिता की रक्षा करने वाले सैनिकों के बलिदान का सम्मान, संविधान एवं उसके आदर्शों के प्रति निष्ठा तथा राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रगान की गरिमा बनाए रखना नागरिक कर्तव्य एवं राष्ट्रधर्म की महत्वपूर्ण अभिव्यक्तियाँ हैं। राष्ट्रहित के विरुद्ध होने वाली आलोचना और राष्ट्रहित में की जाने वाली रचनात्मक असहमति में अंतर किया जाना चाहिए।”
मेरे विचार से यह रूप आपके “संविधान-सम्मत, समतामूलक, रचनात्मक, आत्मनिर्भर एवं राष्ट्रहितैषी लोकतंत्र” की अवधारणा के लिए अधिक मजबूत संवैधानिक आधार प्रदान करता है।
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