सोमवार, 12 जनवरी 2026

होमियोपैथिक चिकित्सा पद्धति में बताया गया है कि "समं समे समयति" अर्थात् जिस वस्तु के प्रयोग या उपयोग से कोई एक या अनेक रोग लक्षण उत्पन्न होता है, उसी वस्तु के सूक्ष्म, सूक्ष्मतर या सूक्ष्मतम अंश का प्रयोग या उपयोग करने से उक्त रोग समाप्त होता है। होमियोपैथिक चिकित्सा पद्धति के जनक महात्मा डॉ० हैनीमैन के अनुसार खनिज, जीव और वनस्पति से रोग लक्षण उत्पन्न होता है और उसी से रोग का नाश होता है, लेकिन वास्तव में किसी सजीव प्राणी की "जीवनी शक्ति" के स्वाभाविक क्रिया कलापों में उसके वातावरण में उपस्थित कोई भी उद्दीपन यथा खनिज, जीव, वनस्पति और / या पर्यावरण से सम्बन्धित कोई जैव रासायनिक प्रभाव या परिवर्तन पैदा होता है एवं उस प्राणी के शारीरिक, मानसिक और / या मनोदैहिक स्थिति को प्रभावित करता है, तो वह प्राणी स्वयं को और/या उसके पर्यवेक्षक और/या कोई विशिष्ट वैज्ञानिक संसाधन की दृष्टि में रुग्ण माने जाते हैं और होमियोपैथिक चिकित्सा पद्धति में उन्हीं उद्दीपनों यथा खनिज, जीव, वनस्पति और / या पर्यावरण से सम्बन्धित जैव रासायनिक तत्वों से प्राणी को पुनः प्रभावित किया जाता है, जिससे शरीस्थ स्थूल विष सूक्ष्म विष के प्रभाव से विखण्डित होने लगता है और जीवनी शक्ति उसे मल, मूत्र, दस्त, बलगम, आँसू, आँखों के कीचड़, नाक के श्राव, वमन, फोड़े-फुन्सी, घाव या अन्य चर्म विकार, पसीना आदि के माध्यम से शरीर से बाहर कर देती है, जिससे प्राणी में आवश्यक जैव रासायनिक तत्वों या नमक या उत्तकों का स्वत: सन्तुलन हो जाता है, जिसे बायोकेमिक चिकित्सक बिना किसी अन्य चिकित्सा पद्धति के सहयोग से सन्तुलित कर लेते हैं और जीवनी शक्ति की प्रबलता में वृद्धि होने लगती है, स्नायु और तंत्रिका तंत्र स्वस्थ हो जाता है, कोशिकाओं में सोडियम और पोटैशियम आयोन का सन्तुलन हो जाता है, मस्तिष्क द्वारा संवेदी आवेगों की ग्रहणशीलता और तत्सम्बन्धी शारीरिक, मानसिक या मनोदैहिक सन्तुलन हेतु शरीर के विशिष्ट अंगों को आवश्यक निर्देश दिए जाते है, जिससे प्राणी का मूल प्रवृत्ति जन्य या वातावरण प्रेरित या मनोदैहिक सन्तुलन सम्बन्धित किसी भी प्रकार का आवश्यक, संवेगात्मक एवं समायोजनात्मक सन्तुलन स्थापित होता है और प्राणी निर्दोष आरोग्य के पथ पर अग्रसर होता है या प्राप्त करता है।

"होमियोपैथिक चिकित्सा पद्धति में बताया गया है कि "समं समे समयति" अर्थात् जिस वस्तु के प्रयोग या उपयोग से कोई एक या अनेक रोग लक्षण उत्पन्न होता है, उसी वस्तु के सूक्ष्म, सूक्ष्मतर या सूक्ष्मतम अंश का प्रयोग या उपयोग करने से उक्त रोग समाप्त होता है। होमियोपैथिक चिकित्सा पद्धति के जनक महात्मा डॉ० हैनीमैन के अनुसार खनिज, जीव और वनस्पति से रोग लक्षण उत्पन्न होता है और उसी से रोग का नाश होता है, लेकिन वास्तव में किसी सजीव प्राणी की "जीवनी शक्ति" के स्वाभाविक क्रिया कलापों में उसके वातावरण में उपस्थित कोई भी उद्दीपन यथा खनिज, जीव, वनस्पति और / या पर्यावरण से सम्बन्धित कोई जैव रासायनिक प्रभाव या परिवर्तन पैदा होता है एवं उस प्राणी के शारीरिक, मानसिक और / या मनोदैहिक स्थिति को प्रभावित करता है, तो वह प्राणी स्वयं को और/या उसके पर्यवेक्षक और/या कोई विशिष्ट वैज्ञानिक संसाधन की दृष्टि में रुग्ण माने जाते हैं और होमियोपैथिक चिकित्सा पद्धति में उन्हीं उद्दीपनों यथा खनिज, जीव, वनस्पति और / या पर्यावरण से सम्बन्धित जैव रासायनिक तत्वों से प्राणी को पुनः प्रभावित किया जाता है, जिससे शरीस्थ स्थूल विष सूक्ष्म विष के प्रभाव से विखण्डित होने लगता है और जीवनी शक्ति उसे मल, मूत्र, दस्त, बलगम, आँसू, आँखों के कीचड़, नाक के श्राव, वमन, फोड़े-फुन्सी, घाव या अन्य चर्म विकार, पसीना आदि के माध्यम से शरीर से बाहर कर देती है, जिससे प्राणी में आवश्यक जैव रासायनिक तत्वों या नमक या उत्तकों का स्वत: सन्तुलन हो जाता है, जिसे बायोकेमिक चिकित्सक बिना किसी अन्य चिकित्सा पद्धति के सहयोग से सन्तुलित कर लेते हैं और जीवनी शक्ति की प्रबलता में वृद्धि होने लगती है, स्नायु और तंत्रिका तंत्र स्वस्थ हो जाता है, कोशिकाओं में सोडियम और पोटैशियम आयोन का सन्तुलन हो जाता है, मस्तिष्क द्वारा संवेदी आवेगों की ग्रहणशीलता और तत्सम्बन्धी शारीरिक, मानसिक या मनोदैहिक सन्तुलन हेतु शरीर के विशिष्ट अंगों को आवश्यक निर्देश दिए जाते है, जिससे प्राणी का मूल प्रवृत्ति जन्य या वातावरण प्रेरित या मनोदैहिक सन्तुलन सम्बन्धित किसी भी प्रकार का आवश्यक, संवेगात्मक एवं समायोजनात्मक सन्तुलन स्थापित होता है और प्राणी निर्दोष आरोग्य के पथ पर अग्रसर होता है या प्राप्त करता है।"
वास्तव में "समं समे समयति" का सिद्धांत हर रुग्णता की परिस्थिति में उपयोग में नहीं आता है, जिसके लिये अधोलिखित परिस्थितियाँ उत्तरदायी हो सकती हैं:-

  1. प्राणी के वातावरण में जिन उद्दीपनों का अभाव रहा है, उनसे सम्बन्धित रोग लक्षणों का अनुभव प्राणी या व्यक्ति को होना और / या प्रेक्षक को होना और / या वैज्ञानिक संसाधनों से प्राप्त होना।
  2. किसी मनोवैज्ञानिक प्रभाव से रुग्ण होना।
  3. किसी अभ्यान्तरिक प्रभाव या असन्तुलन से रुग्ण होना।

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