शनिवार, 17 जनवरी 2026

काव्य की परिभाषा :-



गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017
कविता :-
"कविता या काव्य मानव के अन्त:स्थल में प्रसुप्तावस्था में पुष्पित , पल्लवित एवं विकसित हो रही वह चैतन्यता है, जो अपनी प्राकृतिक एवं स्वाभाविक अभिव्यक्ति हेतु प्राय: भाषा और साहित्य के वैयाकरणिक प्रतिबन्धों तथा अनुशासनिक मानदण्डों को अंगीकार करते हुए भाव प्रवाह की अविरल धारा का आनन्द लेते हुए अन्तः उद्भूत सहज प्रेरणा के स्नेहिल स्पर्श एवं अवचेतनता के स्वप्निल आनन्द के साथ चराचर को संगीतमयता या लयबद्धता में सराबोर करने की मानसिकता के साथ अपनी अचेतनता में व्याप्त अवगुंठन को सुलझाने के प्रयास एवं अपने आप को समाज में प्रतिष्ठापित करने की प्रतिबद्धता के साथ ही अपनी प्राकृतिक रचनात्मकता की स्वाभाविक, लिपिबद्ध या गेय रचनात्मक अभिव्यक्ति है।"

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार 'शैलज', (प्राचार्य सह विभागाध्यक्ष मनोविज्ञान, मधैपुरा जवाहर ज्योति महाविद्यालय, ममारकपुर, बनवारीपुर, बेगूसराय, कालेज कोड :८४०१४),
पता:- पचम्बा, बेगूसराय (८५१२१८). 
***********************************
गूगल ट्रान्सलेटर द्वारा अंग्रेजी एवं संस्कृत में अनुवाद :-
***********************************
Thursday, February 2, 2017

Poem:

"Poetry or verse is that consciousness, dormant within the human heart, which blossoms, flourishes, and develops, and which, for its natural and spontaneous expression, often embraces the grammatical constraints and disciplinary standards of language and literature, while enjoying the continuous flow of emotions. It is the natural, written, or sung creative expression of one's inherent creativity, accompanied by the affectionate touch of inner inspiration and the dreamy joy of the subconscious, with a mindset to imbue the entire universe with musicality or rhythm, and with an attempt to unravel the veil of unconsciousness and a commitment to establish oneself in society."

Dr. Prof. Awadhesh Kumar 'Shailaj', (Principal cum Head of Department of Psychology, Madhepura Jawahar Jyoti College, Mamarkpur, Banwaripur, Begusarai, College Code: 84014),

Address: Pachamba, Begusarai (851218) 
***********************************

२०१७ फेब्रुवरी २ दिनाङ्के गुरुवासरः

काव्य:

"काव्यं वा काव्यं वा सा चैतन्यं यत् मनुष्यस्य अन्तः प्रफुल्लितं, प्रफुल्लितं, सुप्तं च विकसितं भवति। तस्य स्वाभाविकस्य स्वतःस्फूर्तस्य च अभिव्यक्तिः कृते प्रायः भाषासाहित्यस्य व्याकरणिकबाधाः अनुशासनात्मकाः मानकाः च स्वीकुर्वति, भावानाम् निरन्तरप्रवाहं भुङ्क्ते, आन्तरिकप्रेरणायाः स्नेहस्पर्शं, अवचेतनस्य स्वप्नात्मकं आनन्दं च भोजयति, सह अचेतनतां व्याप्तं पर्दां समाधानार्थं प्रयत्नेन, समाजे स्वस्य स्थापनायाः प्रतिबद्धतां च कृत्वा, स्वस्य स्वाभाविकसृजनशीलतायाः स्वाभाविकं, लिखितं, गीतात्मकं वा सृजनात्मकं अभिव्यक्तिं च सर्वेषां भूतानाम् सङ्गीतत्वे लये वा निमज्जयितुं मानसिकता

डॉ० प्रो० अवधेश कुमार 'शैलज', (प्राचार्य सह विभागाध्यक्ष मनोविज्ञान, मधैपुरा जवाहर ज्योति महाविद्यालय, ममारकपुर, बनवारीपुर, बेगूसराय, कालेज कोड :८४०१४),
पता:- पचम्बा, बेगूसराय (८५१२१८).

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें