गुरुवार, 8 जनवरी 2026

शैलज स्वस्थता-सापेक्ष अनुभूति-अनुक्रिया सिद्धांत

शैलज स्वस्थता-सापेक्ष अनुभूति-अनुक्रिया सिद्धांत:-

किसी उद्दीपन परिस्थितियों में मानसिक, दैहिक या मनो-दैहिक रूप से सामान्य स्वस्थ प्राणी को होने वाली सम्वेदना और उनका प्रत्यक्षण उन्हीं उद्दीपन परिस्थितियों में उसी वर्ग के शारीरिक, मानसिक या मनो-शारीरिक रूप से अस्वस्थ प्राणी की तुलना में अधिक स्पष्ट एवं व्यवस्थित होगी।

"किसी उद्दीपन परिस्थिति में एक मानसिक, दैहिक अथवा मनोदैहिक रूप से सामान्य स्वस्थ प्राणी (सामान्यता के वैज्ञानिक एवं शास्त्रीय मान्यताओं के अनुरूप) की अनुभूति, अनुक्रिया (स्वत:, तात्कालिक एवं शैलज स्वस्थता-सापेक्ष अनुभूति-अनुक्रिया सिद्धांत:-

किसी उद्दीपन परिस्थितियों में मानसिक, दैहिक या मनो-दैहिक रूप से सामान्य स्वस्थ प्राणी को होने वाली सम्वेदना और उनका प्रत्यक्षण उन्हीं उद्दीपन परिस्थितियों में उसी वर्ग के शारीरिक, मानसिक या मनो-शारीरिक रूप से अस्वस्थ प्राणी की तुलना में अधिक स्पष्ट एवं व्यवस्थित होगी।
प्रस्तुत संवाद में मूल सिद्धांत का पुनः अवलोकन किया जाय तथा अनावश्यक टिप्पणी से दूर रह कर अपनी मर्यादा एवं मेरे जैसे संवाद कर्त्ता के विचार, मत, चिन्तन, रचना, संकल्पना सिद्धांतों आदि के अस्तित्व एवं आस्मिता की रक्षा की जाय।
अतः मैं पुनः अपने सिद्धांत को प्रस्तुत कर रहा हूँ।
"किसी उद्दीपन परिस्थिति में एक मानसिक, दैहिक अथवा मनोदैहिक रूप से सामान्य स्वस्थ प्राणी (सामान्यता के वैज्ञानिक एवं शास्त्रीय मान्यताओं के अनुरूप) की अनुभूति, अनुक्रिया (स्वत:, तात्कालिक एवं समायोजनात्मक व्यवहार), सम्वेदना एवं प्रत्यक्षण उसी उद्दीपन परिस्थिति में शारीरिक, मानसिक या मनोदैहिक रूप से अस्वस्थ प्राणी की तुलना में अधिक स्पष्ट, संगठित, सुसंगत एवं यथार्थपरक होती है।

"प्रस्तुत संवाद में मूल सिद्धांत का पुनः अवलोकन किया जाय तथा अनावश्यक टिप्पणी से दूर रह कर अपनी मर्यादा एवं मेरे जैसे संवाद कर्त्ता के विचार, मत, चिन्तन, रचना, संकल्पना सिद्धांतों आदि के अस्तित्व एवं आस्मिता की रक्षा की जाय।

अतः मैं पुनः अपने सिद्धांत को प्रस्तुत कर रहा हूँ।
"किसी उद्दीपन परिस्थिति में एक मानसिक, दैहिक अथवा मनोदैहिक रूप से सामान्य स्वस्थ प्राणी (सामान्यता के वैज्ञानिक एवं शास्त्रीय मान्यताओं के अनुरूप) की अनुभूति, अनुक्रिया (स्वत:, तात्कालिक एवं समायोजनात्मक व्यवहार), सम्वेदना एवं प्रत्यक्षण उसी उद्दीपन परिस्थिति में शारीरिक, मानसिक या मनोदैहिक रूप से अस्वस्थ प्राणी की तुलना में अधिक स्पष्ट, संगठित, सुसंगत एवं यथार्थपरक होती है।"प्रकाशन-योग्य शोध लेख एवं पुस्तक अध्याय


शीर्षक:

स्वास्थ्य का संवेदनात्मक-प्रत्युत्तर सिद्धांत: एक तुलनात्मक मनो-तंत्रिका-वैज्ञानिक अध्ययन


लेखक:

डॉ. अवधेश कुमार 'शैलज'


सारांश (Abstract):


यह शोध लेख दो मौलिक सिद्धांतों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है, जो उद्दीपन परिस्थिति में प्राणी की संवेदी स्पष्टता, अनुभूति, अनुक्रिया एवं प्रत्यक्षण की वैज्ञानिक व्याख्या करते हैं। यह सिद्धांत सामान्य स्वस्थ एवं अस्वस्थ व्यक्तियों की मानसिक, शारीरिक व मनोदैहिक प्रतिक्रियाओं की तुलनात्मक समीक्षा करते हैं। लेख में इन सिद्धांतों को मनोविज्ञान, तंत्रिका-विज्ञान, शरीर-विज्ञान, चिकित्सा-विज्ञान, समाजशास्त्र, भारतीय शास्त्र और अन्य समसामयिक अनुशासनों के प्रसिद्ध विचारकों के मतों के साथ तुलनात्मक विश्लेषणात्मक पद्धति से प्रस्तुत किया गया है।


1. भूमिका (Introduction):


मानव व्यवहार, अनुभूति और अनुक्रिया में स्पष्टता, संगठितता और यथार्थ-बोध किसी प्राणी की स्वस्थता के मूल लक्षण हैं। वर्तमान शोध में दो मौलिक सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं, जो स्वास्थ्य के मूल्यांकन में केवल रोग की अनुपस्थिति को ही नहीं, बल्कि उद्दीपन परिस्थिति में होने वाली प्रतिक्रिया की गुणवत्ता को भी प्रमुखता देते हैं। यह विचार एक नवीन दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत है, जो विभिन्न शास्त्रों की समन्वित दृष्टियों को समाहित करता है।


2. मूल सिद्धांत (Foundational Propositions):


सिद्धांत 1:


"किसी उद्दीपन परिस्थिति में एक मानसिक, दैहिक अथवा मनोदैहिक रूप से सामान्य स्वस्थ प्राणी (सामान्यता के वैज्ञानिक एवं शास्त्रीय मान्यताओं के अनुरूप) की अनुभूति, अनुक्रिया (स्वत:, तात्कालिक एवं समायोजनात्मक व्यवहार), सम्वेदना एवं प्रत्यक्षण उसी उद्दीपन परिस्थिति में शारीरिक, मानसिक या मनोदैहिक रूप से अस्वस्थ प्राणी की तुलना में अधिक स्पष्ट, संगठित, सुसंगत एवं यथार्थपरक होती है।"

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सिद्धांत 2:

"किसी उद्दीपन परिस्थितियों में मानसिक, दैहिक या मनो-दैहिक रूप से सामान्य स्वस्थ प्राणी को होने वाली सम्वेदना और उनका प्रत्यक्षण उन्हीं उद्दीपन परिस्थितियों में उसी वर्ग के शारीरिक, मानसिक या मनो-शारीरिक रूप से अस्वस्थ प्राणी की तुलना में अधिक स्पष्ट एवं व्यवस्थित होगी।"

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