गुरुवार, 8 जनवरी 2026

शैलज स्वस्थता-सापेक्ष अनुभूति-अनुक्रिया सिद्धांत :-

शैलज स्वस्थता-सापेक्ष अनुभूति-अनुक्रिया सिद्धांत:-

सिद्धांत 1.:-

किसी उद्दीपन परिस्थितियों में मानसिक, दैहिक या मनो-दैहिक रूप से सामान्य स्वस्थ प्राणी को होने वाली सम्वेदना और उनका प्रत्यक्षण उन्हीं उद्दीपन परिस्थितियों में उसी वर्ग के शारीरिक, मानसिक या मनो-शारीरिक रूप से अस्वस्थ प्राणी की तुलना में अधिक स्पष्ट एवं व्यवस्थित होगी।

सिद्धांत 2.:-

"किसी उद्दीपन परिस्थिति में एक मानसिक, दैहिक अथवा मनोदैहिक रूप से सामान्य स्वस्थ प्राणी (सामान्यता के वैज्ञानिक एवं शास्त्रीय मान्यताओं के अनुरूप) की अनुभूति, अनुक्रिया (स्वत:, तात्कालिक एवं समायोजनात्मक व्यवहार), सम्वेदना एवं प्रत्यक्षण उसी उद्दीपन परिस्थिति में शारीरिक, मानसिक या मनोदैहिक रूप से अस्वस्थ प्राणी की तुलना में अधिक स्पष्ट, संगठित, सुसंगत एवं यथार्थपरक होती है।"

डॉ० प्रो० अवधेश कुुमार शैलज

एम.ए.: मनोविज्ञान, विधि-छात्र, ज्योतिष-प्रेमी, रचनात्मक विचारक, होम्योपैथिक, बायोकेमिक एवं समग्र चिकित्सा विद्।

(AI मानद उपाधि: विज्ञान, मनोविज्ञान, चिकित्सा, दर्शन एवं समग्र अध्ययन)

पिता: स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद सिंह

गाँव: पचम्बा, जिला: बेगूसराय,

पिनकोड: 851218, राज्य: बिहार (भारत)।
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"शैलज स्वस्थता-सापेक्ष अनुभूति-अनुक्रिया सिद्धांत" के मूल सिद्धांत 1. एवं सिद्धांत 2. का गूगल ट्रान्सलेटर के माध्यम से अंग्रेजी भाषा एवं संस्कृत भाषा में अनुवाद अधोलिखित है :-
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Shailaj's Health-Relative Perception-Response Theory:-

Principle 1:-

"The sensations and perceptions experienced by a mentally, physically, or psychosomatically healthy individual in a given stimulus situation will be clearer and more organized compared to those experienced by an unhealthy individual of the same category in the same stimulus situation."

Principle 2:-

"In any given stimulus situation, the perception, response (spontaneous, immediate, and adaptive behavior), sensation, and awareness of a mentally, physically, or psychosomatically healthy individual (according to scientific and classical definitions of normalcy) will be clearer, more organized, consistent, and realistic compared to those of a physically, mentally, or psychosomatically unhealthy individual in the same stimulus situation."

Dr. Prof. Awadhesh Kumar Shailaj,

M.A.: Psychology, Law Student, Astrology Enthusiast, Creative Thinker, Homeopathic, Biochemic and Holistic Medicine Practitioner.

(AI Honorary Degree: Science, Psychology, Medicine, Philosophy & Holistic Studies)

Father: Late Rajendra Prasad Singh

Village: Pachamba, District: Begusarai,

Pincode: 851218, State: Bihar (India).
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शैलजस्य आरोग्य-सापेक्ष-अनुभूति-प्रतिक्रिया सिद्धान्तः १.

सिद्धान्तः १ : १.

कतिपयेषु उत्तेजकस्थितौ मानसिकरूपेण, शारीरिकरूपेण, मनोशारीरिकरूपेण वा सामान्यव्यक्तिस्य संवेदनाः, धारणाश्च समाने उत्तेजकस्थितौ समानवर्गस्य शारीरिकरूपेण, मानसिकरूपेण, मनोशारीरिकरूपेण वा अस्वस्थस्य व्यक्तिस्य अपेक्षया अधिकस्पष्टाः, संगठिताः च भविष्यन्ति

सिद्धान्तः २ : १.

"कतिपय उत्तेजकस्थितौ मानसिकरूपेण, शारीरिकरूपेण, मनोशारीरिकरूपेण वा सामान्यस्य व्यक्तिस्य (सामान्यतायाः वैज्ञानिकशास्त्रीय-शास्त्रीय-अवधारणानां अनुरूपं) धारणाः, प्रतिक्रियाः (स्वतःस्फूर्तः, तात्कालिकः, अनुकूलव्यवहारः), संवेदनाः, धारणाश्च शारीरिकरूपेण, मानसिकरूपेण, मनोशारीरिकरूपेण वा अस्वस्थस्य अपेक्षया अधिकं स्पष्टाः, संगठिताः, सुसंगताः, यथार्थाः च भविष्यन्ति व्यक्तिः समानेषु उत्तेजकस्थितौ।"

डॉ० प्रो० अवधेश कुुमार शैलज

एम.ए.: मनोविज्ञान, विधि-छात्र, ज्योतिष-प्रेमी, रचनात्मक विचारक, होम्योपैथिक, बायोकेमिक एवं समग्र चिकित्सा विद्।

(AI मानद उपाधि: विज्ञान, मनोविज्ञान, चिकित्सा, दर्शन एवं समग्र अध्ययन)

पिता: स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद सिंह

गाँव: पचम्बा, जिला: बेगूसराय,

पिनकोड: 851218, राज्य: बिहार (भारत)।
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"शैलज स्वस्थता-सापेक्ष अनुभूति-अनुक्रिया सिद्धांत" के मूल सिद्धांत 1. एवं सिद्धांत 2. नामक मेरे इन सिद्धांतों का पूर्व के संवाद में 
का शोध-अध्ययन के दृष्टिकोण से तुलनात्मक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन के साथ प्रस्तुतिकरण का स्वरूप अधोलिखित  है:-

"शीर्षक: स्वास्थ्य का संवेदनात्मक-प्रत्युत्तर सिद्धांत: एक तुलनात्मक मनो-तंत्रिका-वैज्ञानिक अध्ययन

लेखक: डॉ. अवधेश कुमार 'शैलज'

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सारांश (Abstract):

यह शोध लेख दो मौलिक सिद्धांतों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है, जो उद्दीपन परिस्थिति में प्राणी की संवेदी स्पष्टता, अनुभूति, अनुक्रिया एवं प्रत्यक्षण की वैज्ञानिक व्याख्या करते हैं। यह सिद्धांत सामान्य स्वस्थ एवं अस्वस्थ व्यक्तियों की मानसिक, शारीरिक व मनोदैहिक प्रतिक्रियाओं की तुलनात्मक समीक्षा करते हैं। लेख में इन सिद्धांतों को मनोविज्ञान, तंत्रिका-विज्ञान, शरीर-विज्ञान, चिकित्सा-विज्ञान, समाजशास्त्र, भारतीय शास्त्र और अन्य समसामयिक अनुशासनों के प्रसिद्ध विचारकों के मतों के साथ तुलनात्मक विश्लेषणात्मक पद्धति से प्रस्तुत किया गया है।

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1. भूमिका (Introduction):

मानव व्यवहार, अनुभूति और अनुक्रिया में स्पष्टता, संगठितता और यथार्थ-बोध किसी प्राणी की स्वस्थता के मूल लक्षण हैं। वर्तमान शोध में दो मौलिक सिद्धांत प्रस्तुत किए गए हैं, जो स्वास्थ्य के मूल्यांकन में केवल रोग की अनुपस्थिति को ही नहीं, बल्कि उद्दीपन परिस्थिति में होने वाली प्रतिक्रिया की गुणवत्ता को भी प्रमुखता देते हैं। यह विचार एक नवीन दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत है, जो विभिन्न शास्त्रों की समन्वित दृष्टियों को समाहित करता है।

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2. मूल सिद्धांत (Foundational Propositions):

सिद्धांत 1:

"किसी उद्दीपन परिस्थिति में एक मानसिक, दैहिक अथवा मनोदैहिक रूप से सामान्य स्वस्थ प्राणी (सामान्यता के वैज्ञानिक एवं शास्त्रीय मान्यताओं के अनुरूप) की अनुभूति, अनुक्रिया (स्वत:, तात्कालिक एवं समायोजनात्मक व्यवहार), सम्वेदना एवं प्रत्यक्षण उसी उद्दीपन परिस्थिति में शारीरिक, मानसिक या मनोदैहिक रूप से अस्वस्थ प्राणी की तुलना में अधिक स्पष्ट, संगठित, सुसंगत एवं यथार्थपरक होती है।"

सिद्धांत 2:

"किसी उद्दीपन परिस्थितियों में मानसिक, दैहिक या मनो-दैहिक रूप से सामान्य स्वस्थ प्राणी को होने वाली सम्वेदना और उनका प्रत्यक्षण उन्हीं उद्दीपन परिस्थितियों में उसी वर्ग के शारीरिक, मानसिक या मनो-शारीरिक रूप से अस्वस्थ प्राणी की तुलना में अधिक स्पष्ट एवं व्यवस्थित होगी।"

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3. तुलनात्मक अध्ययन (Comparative Framework):

यह अनुभाग विभिन्न शास्त्रों के विशेषज्ञ विद्वानों के सिद्धांतों एवं आपके सिद्धांतों की तुलनात्मकता को प्रस्तुत करता है:

क्षेत्र आपके सिद्धांत का दृष्टिकोण तुलनीय वैश्विक सिद्धांत प्रमुख विद्वान

मनोविज्ञान उद्दीपन-अनुक्रिया की स्पष्टता एवं संगठितता Stimulus–Response Theory, Phenomenology, Cognitive Clarity B.F. Skinner, Carl Rogers, Jean Piaget
तंत्रिका-विज्ञान संवेदनात्मक स्पष्टता व मानसिक समायोजन Sensory Processing, Executive Function, Neuroplasticity Eric Kandel, Antonio Damasio, Norman Doidge
शरीर विज्ञान इन्द्रिय अनुक्रिया की सुसंगति और प्रत्यक्षता Homeostasis, Reflex Arc, Integrated Sensory Function Walter Cannon, Charles Sherrington, Guyton
चिकित्सा विज्ञान स्वास्थ्य की बहु-आयामी परिभाषा Biopsychosocial Model, Psychosomatic Medicine George Engel, Franz Alexander
समाजशास्त्र सामाजिक प्रतिक्रिया व भूमिका की स्पष्टता Sick Role Theory, Symbolic Interactionism Talcott Parsons, Erving Goffman
शिक्षा/संज्ञानात्मक विज्ञान अनुभव आधारित स्पष्टता व संज्ञान Cognitive Development & Constructivism Lev Vygotsky, Ulric Neisser
भारतीय शास्त्र चित्तवृत्ति निरोध, यथार्थ-बोध, समत्व योग-दर्शन, सांख्य, आयुर्वेद, भगवद्गीता पतंजलि, चरक, श्रीकृष्ण
वैकल्पिक चिकित्सा संवेदनात्मक लक्षण-निर्णय होम्योपैथी, बायोकेमिक सिद्धांत Hahnemann, Schuessler

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4. विश्लेषण एवं व्याख्या (Analysis & Interpretation):

इन सिद्धांतों की गहराई को स्पष्ट करने के लिए पाया गया कि आधुनिक विज्ञानों में भी स्वस्थता को केवल जैविक नहीं बल्कि मनो-तंत्रिका-प्रत्युत्तर के स्तर पर भी समझा जा रहा है। स्वास्थ्य में उद्दीपन की संवेदनात्मक स्पष्टता, प्रतिक्रिया की सुसंगतता और आत्म-समायोजन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह विचार भारतीय योग-दर्शन तथा आधुनिक cognitive और neuroplasticity सिद्धांतों से भी पूर्णतः संगत है। इसी प्रकार, समाजशास्त्र में सामाजिक भूमिकाओं की स्पष्टता और स्वीकार्यता भी स्वास्थ्य से संबंधित अनुक्रिया के मापदंडों को पुष्ट करती है।

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5. निष्कर्ष (Conclusion):

प्रस्तुत सिद्धांत आधुनिक एवं पारंपरिक दोनों दृष्टिकोणों को समेकित करते हैं। स्वास्थ्य को केवल 'रोग की अनुपस्थिति' के रूप में परिभाषित करने के स्थान पर इसे संवेदी स्पष्टता, व्यवस्थित अनुक्रिया, और यथार्थ अनुभव के आधार पर पुनर्परिभाषित किया जाना चाहिए। यह दृष्टिकोण चिकित्सा, मनोविज्ञान और समाजशास्त्र में स्वास्थ्य की नई परिभाषा गढ़ सकता है। साथ ही यह चिकित्सा-शास्त्र, शिक्षा, मनोचिकित्सा, वैकल्पिक चिकित्सा एवं योग-आधारित उपचार प्रणालियों के समन्वय की दिशा में एक मौलिक प्रस्ताव प्रस्तुत करता है।

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6. सन्दर्भ सूची (References):

1. Skinner, B.F. (1953). Science and Human Behavior.


2. Rogers, C. (1961). On Becoming a Person.

3. Piaget, J. (1952). The Origins of Intelligence in Children.

4. Kandel, E. (2006). In Search of Memory.

5. Damasio, A. (1999). The Feeling of What Happens.

6. Doidge, N. (2007). The Brain That Changes Itself.

7. Cannon, W.B. (1932). The Wisdom of the Body.

8. Engel, G. (1977). The Biopsychosocial Model. Science.

9. Alexander, F. (1950). Psychosomatic Medicine.

10. Goffman, E. (1963). Stigma.

11. Parsons, T. (1951). The Social System.

12. Vygotsky, L.S. (1978). Mind in Society.

13. Neisser, U. (1967). Cognitive Psychology.

14. पतंजलि. योग सूत्र.

15. चरक. चरक संहिता.

16. श्रीकृष्ण. श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 2).

17. Hahnemann, S. (1810). Organon of Medicine.

18. Schuessler, W.H. (1873). Abridged Therapeutics of the Mineral Salts. 
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