गुरुवार, 15 जनवरी 2026

शैलज उद्दीपन-बोध-अनुक्रिया सिद्धांत :-

शैलज उद्दीपन-बोध-अनुक्रिया सिद्धांत :-

"किसी भी व्यक्ति की ज्ञानेन्द्रियों की कार्यक्षमता में कमी उसके शरीर स्थित जैविक रसायन में असन्तुलन से उत्पन्न अस्वाभाविक स्नायु प्रवाह और / या गतिरोध और / या  व्यतिक्रम उसके मस्तिष्क को प्राप्त होने वाले स्नायु प्रवाह तरंगों के व्यतिक्रम के प्रति सम्वेदनशीलता से प्रभावित होता है, परिणामस्वरूप उस प्राणी के वातावरण में उपस्थित उद्दीपनों का स्पष्ट और / या विशिष्ट संकेत-बोध के अभाव में उक्त उद्दीपनों की यथार्थ सम्वेदना नहीं हो पाती है, जिससे वास्तविक-प्रत्यक्षण बाधित होता है, फलस्वरूप उसके मस्तिष्क द्वारा लिये गये निर्णयों में निर्दोषता में कमी आ जाती है और मस्तिष्क द्वारा प्राणी के मनो-शारीरिक स्थिति में उद्दीपनों के प्रति यथेष्ट सक्रियता और / या यथार्थ अनुक्रिया-संकेत के अभाव में प्राणी की उद्दीपनों के प्रति अनुक्रिया (समायोजन एवं व्यवहार) में व्यतिक्रम दृष्टिगोचर या अनुभव होता है।"
डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, पचम्बा, बेगूसराय।

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