आपका यह परिभाषात्मक विश्लेषण गहन दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक एवं जैव वैज्ञानिक दृष्टिकोणों का समन्वय है। इस व्याख्या को विश्लेषणात्मक और अकादमिक भाषा में प्रस्तुत किया जाए तो निम्न रूप में विन्यस्त किया जा सकता है:
जीवन और उसके तत्त्वों की परिभाषा (दार्शनिक-मनोवैज्ञानिक व्याख्या)
1. प्राणी धर्म (Vital Responsiveness):
किसी भी सजीव प्राणी द्वारा अपने पर्यावरण में विद्यमान उद्दीपनों (stimuli) के प्रति जो यथार्थ, अनुभव-सम्यक एवं अनुक्रियात्मक बोध होता है, वही उस प्राणी का प्राणी धर्म कहलाता है। यह उसकी मूलभूत जैव-मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति है, जिससे वह जीवन-संग्राम में सक्रिय रहता है।
2. अर्थ (Resources for Perception):
वातावरणीय उद्दीपनों को ग्रहण करने, उनका विवेचन करने और उनका बोध प्राप्त करने की जो भी इन्द्रिय, बौद्धिक, स्मृतिक अथवा संवेदी क्षमताएँ या माध्यम होते हैं, उन्हें अर्थ कहा जाता है। ये बोध के लिए उपलब्ध साधन हैं।
3. काम (Expectations Arising from Perception):
जब बोध सम्पन्न होता है, तब उससे इच्छाएँ, अपेक्षाएँ, या वांछाएँ उत्पन्न होती हैं, जो किसी दिशा में प्रवृत्त होने के लिए प्रेरित करती हैं। इन्हीं को काम कहा गया है – यह बोधजन्य आकांक्षा है।
4. मोक्ष (Liberation through Disidentification):
वही बोध कभी-कभी ऐसी विवेकपूर्ण अवस्था उत्पन्न करता है जहाँ जीव अपने पर्यावरण से या उसकी अनावश्यक अपेक्षाओं से विरक्ति का अनुभव करता है। यह विरक्ति केवल त्याग नहीं, बल्कि आत्मसाक्षात्कार की दिशा में होने वाला स्वतन्त्रता-बोध है। यही मोक्ष है।
5. जीवनी शक्ति (Vital Energy or Homeostatic Force):
उपरोक्त प्रक्रियाओं को सन्तुलित रखने वाली, सतत क्रियाशील शक्ति जो प्राणी को सम्यक अस्तित्व में बनाए रखती है, उसे जीवनी शक्ति कहते हैं। यह शरीर, मन और आत्मा के बीच सन्तुलन की आधारशिला है।
6. जीवन (Continuity of Dynamic Integration):
जब उपर्युक्त सभी तत्त्व सम्यक रूप से एकीकृत और गतिशील रहते हैं, तो उस निरन्तरता को जीवन कहा जाता है। जीवन केवल शारीरिक क्रियाएँ नहीं, बल्कि अनुभूति, विवेक, क्रिया और मुक्ति के समवेत प्रवाह का नाम है।
यदि चाहें तो मैं इसे शास्त्रीय भारतीय दर्शनों (विशेषतः सांख्य, योग, वेदांत), मनोविज्ञान और आधुनिक जीवविज्ञान के सन्दर्भों से भी और अधिक गहराई से जोड़ सकता हूँ। क्या आप चाहेंगे कि इसे एक अकादमिक शोध-पत्र या पुस्तक अध्याय के रूप में विकसित किया जाए?
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