आज के समय में तो मुफ्त का माल खाने वाले खा कर पचाते ही नहीं, वरन् खिलाने वाले को ही पचाने में लगे रहते हैं।
खैर " जो जैसा करेगा, वैसा पायेगा।
खैर " जो जैसा करेगा, वैसा पायेगा।
" किसी की Biography या Auto-Biography कहीं उपलब्ध हो या न हो, लेकिन प्रकृति के पास उसकी कहानी सुरक्षित रहती है और कोई कुछ भी कह दे जो यथार्थ में है उसमें कोई वास्तविक अन्तर नहीं आता है।
लेकिन देखने और सोचने वालों का अपना दृष्टिकोण होता है। जीवन देने वाले सूरज को भी हम आफताब कहते हैं। अमृत बरसाने वाले शशि पर भी कलंक लगता है, मैथिल कोकिल विद्यापति कहते हैं कि विरहणियों को भगवान श्रीकृष्ण के प्रेम के सामने आनन्दमयी शशि किरणें नहीं सुहाती हैं और वे आरोप लगाती हैं " चानन भेल विषम शर रे, भूषण भेल भारी । " जबकि इसमें चन्द्रमा का क्या दोष ? किसी को भी एक तरफा नहीं बहना चाहिए । किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का मूल्यांकन तत्कालीन परिस्थितियों के आलोक में ही करना समीचीन होता है, परन्तु मूल्यांकन करने वाले को अपने सवालों का मनोनुकूल जबाब चाहिए ।
भोगी और योगी सबके सब अपने आप को प्रतिष्ठित करने में लगे हुए हैं, अपनी- अपनी तस्वीरों को लेकर वेतहाशा न जाने कहाँ और किधर दौड़े चले जा रहे हैं। सबके दिमाग में एक ही बात चल रही है " सदा के लिए जोड़नी है और जग में अपनी छाप छोड़नी है। " भले ही सबके सब इस सत्य से लगभग अवगत हैं कि यह जो कुछ दृष्टगोचर हो रहा है किसी भी क्षण मिटाने वाला है, फिर भी वे विरले हैं जिनका मोह जल्द गया है। सभी अपनी डफली, अपना राग अलाप रहे हैं। गाँधी ने तो अल्ला-ईश्वर के एकत्व में अपने आप को जोड़ने की कोशिश की । "अल्ला-ईश्वर तेरा नाम सबको सम्मति दे भगवान्।" लेकिन आज भी अल्ला-ईश्वर विवाद में पड़े हुए हैं, मिश्नरियाँ अपना काम कर रही हैं और वक्त के तवे पर राजनीतिक रोटी सेंकी जा रही है ।
कहते हैं भारत की आत्मा गाँवों में बसती है, लेकिन स्मार्ट सिटी की चमक दमक तो कुछ और ही है तथा गाँव के गँवार लड़के जब शहर या सत्ता के दोहरे व्यक्तित्व का एक बार भी रसास्वादन कर लेते हैं, तो ऐसे बाबू के लिए उन्हें जन्म देने वाले पिता नौकर एवं सत्ता का सुख देने वाली जनता " गदहे के समान "अथवा " धोवी का कुत्ता न घर का न घाट का " के समान हो जाते हैं। वास्तव में भूखे-नंगों को क्या ? जो मरा हुआ है , उसे मिट्टी पलीद कर दो या उस पर सौ मन चन्दन लाद दो। अन्धे को क्या ? उसे तो जब पत्तल पर गड़गड़ायेगा और मुँह में जायेगा तो पता चलेगा कि घी वास्तव में गड़गड़ाया है। वह तो सुना है कि " बदा होईहैं, तब खईहैं। " उसे तो याद है भारत के भूतपूर्व प्रधान मंत्री माननीय राजीव गाँधी ने बिहार राज्य के बेगूसराय मण्डलान्तर्गत उलाव स्थित हवाई अड्डे पर अपार जन सभा को सम्बोधित करते हुए , भारत की जनता के दर्द को समझते हुए एवं भारत की जनता एवं यहाँ के प्रशासनतंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार का खुलासा करते हुए कहा था कि " मैं एक रपया भेजता हूँ, जनता को 15 पैसे मिलते है। " सच में जहाँ "अंधेर नगरी चौपठ राजा हो" वहाँ " टके सेर सब कुछ मिलता है " और तो और वहाँ फाँसी का फंदा जिसके गले में सेट कर जाये, उस गैर-अपराधी को भी अपराधी मान कर फाँसी दे दी जाती है। यह तो हमारा प्रशासन तंत्र एवं हमारे देश की संवैधानिक शक्तियाँ हैं, जो हमारे मूल संविधान में आवश्यकता एवं भूल के नाम पर एक ओर जहाँ सामयिक परिस्थिति वश अत्यावश्यक संशोधन या परिवर्तन किया, वहीं संविधान को अपने-अपने समय के सत्ता धारियों ने अपने और अपनों के पक्ष में विकसित किया एवं संविधान को किंकर्तव्यविमूढ़ स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया, जहाँ हमारी क्षमता एवं तर्क के सामने प्रायः वास्तविकता एवं सत्य को जलील किया जाता है, लेकिन लोग कहते हैं और हर किसी का दिल स्वीकार करता है कि " सत्य परेशान हो सकता है , लेकिन हारता नहीं है। "
आदर्शों का चीरहरण हो रहा है और उसके रक्षक चुप बैठे हुए हैं। खैर भोगना तो होगा ही सबों को। कर्म फल गाय के बछड़े के समान कर्त्ता के पीछे-पीछे चलता है। भगवान देव और दानव सबको एक समान अवसर देते हैं, दोनों पक्षों को मनोनुकूल वरदान देते हैं, परन्तु मन ही मन सबों को " दिव्यं भव " का वरदान भी देते हैं, लेकिन मनोनुकूल वरदान पाकर देव या दानव जब-जब मद मस्त हो गये हैं, अहंकार ने उन्हें पथ भ्रष्ट कर दिया है और वे निवृत्ति मार्गी होते हुए भी घनघोर प्रवृत्ति मार्गी हो जाते हैं।
थियोसोफिकल सोसायटी की प्रसिद्ध हिन्दी पत्रिका "अध्यात्म ज्योति" में "सत्य की ओर" नाम से प्रकाशित इन पंक्तियों के लेखक एवं उनके akshailaj.blogspot.com द्वारा जारी "प्रज्ञा सूक्तं" में कहा गया है कि " पतनेव प्रवृत्तिरूच्यते ।"
मद किसे नहीं होता है " यौवनं ,धन सम्पत्ति:, प्रभुत्वं, अविवेकिता । एकैकमऽपि अनर्थाय, किमु यत्र चतुष्टयम् ।। "
भगवान की माया अपार है । केशव कहते हैं" मम माया दुरत्यया।" उन्होंने अपने अन्तरंग नरेन्द्र को भी अपनी माया में डाल दिया और बचपन से आर्थिक एवं मनोशारीरिक रूप से विकलांग बाल, वृद्ध, युवा नर-नारी के प्रति समाज के कुछ लोगों के अमानवीय व्यवहार से प्रभावित नरेन्द्र ने विकलांगो के उत्साहवर्धन हेतु उन्हें दिव्यांग कह कर दिव्यांगता को विकलांगता का पर्याय घोषित कर दिया है। इस तरह विकलांगों को दिव्यांगता का वरदान तो मिल गया ,उन्हें सम्मान अवश्य मिला, उनका उत्साह वर्धन हुआ और उन्हें कुछ सहायता भी मिल रही है, लेकिन वे दिव्यांग हो नहीं पाये, जबकि उनके समुचित देखरेख की अहर्निश जरुरत है और राजा का कर्त्तव्य है कि वे राष्ट्र हितैषी एवं विश्व हितैषी जनों तथा विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों के सहयोग से स्वदेश एवं विश्व के प्राणियों के सम्यक् विकास तथा मनोशारीरिक हित में कल्याण का मार्ग प्रशस्त करें।
नरेन्द्र द्वारा विकलांगो को दिव्यांग कह देने से पितामह ब्रम्हा जी परेशान हो गए। वे तो एक बार जो लिख देते उसे बदलते नहीं है, लेकिन अज जाया सरस्वती जी ने इस पर विशेष ध्यान नहीं देकर समय पर छोड़ दिया और नारदजी भी नारायण का नाम लेकर कर्म फल की प्रतीक्षा में वैकुण्ठ चले गये ।
नरेन्द्र की सलाह माँ शारदे भी मानती हैं, तभी तो सभी वैयाकरणों की बोलती बंद हो गई, क्योंकि जिस तरह भगवान् राम ने पत्थर की अहिल्या को छू दिया तो वह श्रापित स्त्री जीवन्त नारी हो गई, इस लड़के ( जो अब हमारे देश और समाज के ही नहीं वरन् विश्व के माननीय व्यक्तित्व में से एक हैं ) की कृपा से विकलांग अब दिव्यांग कहलाने लगे। परन्तु यह विचारणीय और द्रष्टव्य है कि माँ दुर्गा कहती हैं " यं यं चिन्तयेत् कामं, तं तं प्राप्नोति निश्चितम् ।।
" अक्षर ब्रह्म होते हैं। हर अक्षर, शब्द एवं वाक्य का अपना महत्व होता है और हमें किसी भी भाषा-साहित्य के संविधान में उसके अस्तित्व एवं अस्मिता के विरुद्ध हस्तक्षेप करने का कोई नैतिक आधार नहीं है। विकलांग के लिए जब से दिव्यांग का प्रयोग होने लगा उस समय से दिव्यांग और विकलांग को लोग एक दूसरे का पर्याय मानने लगे हैं जबकि दिव्यांगता विकलांगता का उपचार है और विकलांगता के दोषों को दूर करती है।
नरेन्द्र ने तो पवित्र भाव से विकलांगो को दिव्यांग कहकर उन्हें सम्मानित किया, लेकिन गाँव-समाज में लोग यदि किसी मनोशारीरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति को अब दिव्यांग कह कर पुकारते है तो प्रायः वह आपसी विवाद एवं तनाव का विषय हो जाता है। बाल की खाल निकलने वाले या अति संवेदनशील लोग अब विकलांग होने के भय से भगवान् से भी " दिव्यांग भव " का वरदान मांगने के पक्ष में नहीं हैं। जबकि
शब्द से भी अधिक महत्व भाव का होता है और विवाह आदि मांगलिक अवसरों पर एक दूसरे को दी गई गाली भी कर्णप्रिय एवं आनन्दवर्धक होती है। इसलिए तो कहीं-कहीं पिता और भगवान् के लिए कालांतर से प्रेम और आदरपूर्वक पुकारने में भी "रे" सम्बोधन का प्रयोग या उपयोग होता है, जबकि " रे " सामान्य तौर पर एक अनादर सूचक शब्द है।
कहते हैं कि शब्दों का प्रभाव तो पड़ता ही है।लोगों का विश्वास है कि युग बदल रहा है और आम लोगों का विध्वंसात्मक सोच जिस गति से बढ़ रहा है, उससे उत्पन्न मानव जनित और / या प्राकृतिक प्रभाव के फलस्वरूप नागासाकी एवं हिरोसमा के समान भावी पीढ़ी विकलांगों के बाढ़ का कारक होगा तथा " नरेन्द्र " की भाषा में आने वाले समय में चारों तरफ दिव्यांग ही दिव्यांग दिखाई पड़ेंगे।
भगवान श्रीकृष्ण श्रीमदभगवदगीता में कहते हैं :- "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन:।" और "युक्ताहारविहारस्य, युक्त कर्म सुचेष्ठषु । युक्त स्वप्नाववोधस्य, योगो भवति दु:खहा ।।" परन्तु यह सब कुछ " हसब ठठायब, फुलायब गालू " से नहीं होगा ।
नरेन्द्र को बचपन से ही समय के थपेड़ों ने यह सब कुछ सिखाया और उसमें " देश, काल और पात्र " की समझ विकसित हुई, जिसका विवेकपूर्ण उपयोग मनुष्य को देवताओं से उच्च श्रेणी प्रदान करता है ।
अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए " मनसा, वाचा, कर्मणा " अपने उद्देश्य हेतु समर्पण ईष्ट-सिद्धि प्रदान करता है। वास्तव में हमारे रचनात्मक एवं सकारात्मक सोच से ही हमारा सम्यक् एवं सर्वांगीण विकास संभव है और इसके लिए हमें किसी से भी सीखने में संकोच नहीं करना चाहिए।
नरेन्द्र ने भी हर किसी से सीखने की कोशिश की और महान् उपलब्धि पाने पर भी अपने गुरु को हृदय में स्थान दिया, जो उसके व्यवहार से दृष्टगोचर होता है। नरेन्द्र ने " गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पाँय । बलिहारी गुरु आपनो गोविन्द दियो बताय।। " इस प्रकार नरेन्द्र ने
" मातृ देवो भव । पितृ देवो भव। अतिथि देवो भव। आचार्य देवो भव। " के आदर्शों को अपनाने की कोशिश की और शत्रुओं के साथ भी मित्रवत् व्यवहार कर उसमें विश्व बन्धुत्व, मानवतावादी, रचनात्मक एवं सकारात्मक सोच विकसित करने की कोशिश की परन्तु " मूरख हृदय न चेत, जो गुरु मिलहिं बिरंचि सम " ।
अहंकार तो विनाश का कारक होता ही है। अच्छे बुरे सभी को यह अपने आगोश में समेट लेता है। कहा भी गया है कि " काल दण्ड गहि, काहू नहीं मारा । हरै धर्म, बल, बुद्धि , विचारा।।"
संत कबीर ने भी कहा कि " चलती चाकी देख कर, दिया कबीरा रोय । दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय।।" पर यह धरती रत्न-गर्भा है, यहाँ सेर को सवा सेर से भेंट हो जाती है और यही कारण है कि कबीर के पुत्र कमाल ने उनके जबाव में कहा कि
" चलती चाकी देखकर हँसा कमाल ठठाय, कील पकड़ कर जो रहे, सो साबुत बच जाय।।" भगवान् की शरणागति में जो जाता है, उसे वे वास्तव में दिव्य बना देते हैं। कुब्जा को उन्होंने दिव्यता का वरदान दिया और कुबड़ी से दिव्य (अत्यंत सुन्दर) नारी में परिवर्तित कर दिया। भक्त वत्सल भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं " सर्व धर्माणि परित्यज्य, मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्व पापेभ्यो मोक्षस्यामि मा शुच:।।"
डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज, पचम्बा, बेगूसराय।
कहते हैं भारत की आत्मा गाँवों में बसती है, लेकिन स्मार्ट सिटी की चमक दमक तो कुछ और ही है तथा गाँव के गँवार लड़के जब शहर या सत्ता के दोहरे व्यक्तित्व का एक बार भी रसास्वादन कर लेते हैं, तो ऐसे बाबू के लिए उन्हें जन्म देने वाले पिता नौकर एवं सत्ता का सुख देने वाली जनता " गदहे के समान "अथवा " धोवी का कुत्ता न घर का न घाट का " के समान हो जाते हैं। वास्तव में भूखे-नंगों को क्या ? जो मरा हुआ है , उसे मिट्टी पलीद कर दो या उस पर सौ मन चन्दन लाद दो। अन्धे को क्या ? उसे तो जब पत्तल पर गड़गड़ायेगा और मुँह में जायेगा तो पता चलेगा कि घी वास्तव में गड़गड़ाया है। वह तो सुना है कि " बदा होईहैं, तब खईहैं। "
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