बुधवार, 11 फ़रवरी 2026

EXECUTIVE BRIEF (2-PAGES)Judicial Reform & Due Process Safeguards(For Parliamentary & Policy Decision-Makers)विषय (Subject)लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में “विकृत व्यवस्था तंत्र (Distorted System of Governance)”

EXECUTIVE BRIEF (2-PAGES)
Judicial Reform & Due Process Safeguards
(For Parliamentary & Policy Decision-Makers)
विषय (Subject)
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में “विकृत व्यवस्था तंत्र (Distorted System of Governance)” के उभरते स्वरूप, उससे उत्पन्न संवैधानिक-न्यायिक असंतुलन, तथा आवश्यक सुधारात्मक हस्तक्षेप।
I. संक्षिप्त पृष्ठभूमि (Context in Brief)
भारत का संवैधानिक ढाँचा न्याय, समानता और प्रक्रिया-न्याय (Due Process) पर आधारित है।
हाल के वर्षों में यह प्रवृत्ति दृष्टिगोचर हो रही है कि कुछ विधिक एवं प्रशासनिक प्रक्रियाओं में—
आरोप को ही प्रारंभिक या अंतिम सत्य मान लेने की प्रवृत्ति,
साक्ष्य, सुनवाई और प्रतिरक्षा की भूमिका का क्षरण,
तथाकथित पीड़ित पक्ष की जवाबदेही का अभाव,
तथा एकपक्षीय या अनुमान-आधारित निर्णयों की बढ़ती संख्या।
इन प्रवृत्तियों का संयुक्त परिणाम वह स्थिति है जिसे “विकृत व्यवस्था तंत्र” कहा जा सकता है—जहाँ न्याय का स्वरूप संतुलन से हटकर एकतरफ़ा हो जाता है।
II. मुख्य समस्या (Core Problem)
वर्तमान विधिक परिदृश्य में—
आरोप ≠ प्रमाण का सिद्धांत व्यवहार में कमजोर हो रहा है।
प्रक्रिया-न्याय (Due Process) को औपचारिकता तक सीमित किया जा रहा है।
आरोपी के अधिकार और आरोपकर्ता की जवाबदेही के बीच संतुलन बिगड़ रहा है।
मिथ्या या दुर्भावनापूर्ण आरोप के लिए स्पष्ट दायित्व-प्रावधान अनुपस्थित हैं।
यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता) की आत्मा के प्रतिकूल है।
III. संवैधानिक एवं संस्थागत प्रभाव (Why It Matters)
यदि यह प्रवृत्ति यथावत रहती है, तो—
न्यायपालिका पर जन-विश्वास में क्षरण,
कानून का राजनीतिक/सामाजिक दुरुपयोग,
निर्दोष नागरिकों का मानसिक, सामाजिक एवं विधिक उत्पीड़न,
अपीलों, स्थगन याचिकाओं एवं लंबित मामलों में वृद्धि।
अंततः यह स्थिति न्यायिक संस्थाओं की नैतिक वैधता (Institutional Legitimacy) को प्रभावित कर सकती है।
IV. अंतरराष्ट्रीय संकेत (Comparative Insight)
परिपक्व लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में—
आरोपकर्ता एवं आरोपी—दोनों की प्रक्रियात्मक सुरक्षा,
मिथ्या आरोप हेतु दायित्व निर्धारण,
प्रारंभिक स्तर पर न्यायिक परीक्षण (Judicial Screening)
को अनिवार्य माना जाता है।
भारत में इन सिद्धांतों का संस्थागत रूप से सुदृढ़ किया जाना आवश्यक है।
V. नीति-दृष्टि (Policy Direction Required)
मुख्य आवश्यकता है—
Victim-Centric या Accused-Blind दृष्टिकोण से हटकर
Justice-Centric, Balance-Oriented Framework अपनाने की।
इसका लक्ष्य है—
न तो वास्तविक पीड़ित को कमजोर करना,
न ही निर्दोष को असुरक्षित छोड़ना।
VI. प्रमुख सुधार-प्रस्ताव (Key Reform Proposals)
1. प्रक्रियात्मक सुधार
एकपक्षीय अंतरिम आदेशों से पूर्व अनिवार्य न्यायिक समीक्षा।
कारण-सहित (Reasoned) आदेश का स्पष्ट मानक।
2. जवाबदेही तंत्र
मिथ्या अथवा दुर्भावनापूर्ण आरोप हेतु दंडात्मक उत्तरदायित्व।
प्रक्रिया-दुरुपयोग (Abuse of Process) के लिए स्पष्ट प्रावधान।
3. संस्थागत दिशानिर्देश
उच्च न्यायालय स्तर पर Due Process Guidelines।
निचली न्यायपालिका हेतु मानक Process Protocols।
VII. विधायी एवं नीतिगत हस्तक्षेप (What Can Be Done)
संसदीय/सरकारी स्तर पर—
प्रासंगिक अधिनियमों में संतुलनकारी संशोधन।
न्यायिक प्रशिक्षण में प्रक्रिया-न्याय पर विशेष बल।
न्यायिक प्रदर्शन के मूल्यांकन में प्रक्रियात्मक गुणवत्ता को शामिल करना।
VIII. अपेक्षित परिणाम (Expected Outcomes)
न्यायिक प्रक्रिया में संतुलन, पारदर्शिता और विश्वसनीयता।
निर्दोष नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा।
न्यायपालिका में जन-विश्वास की पुनर्स्थापना।
विधि के दुरुपयोग में व्यवहारिक कमी।
IX. निष्कर्ष (Bottom Line)
यह विषय केवल तकनीकी सुधार का नहीं, बल्कि
लोकतांत्रिक शासन की गुणवत्ता और संविधान की आत्मा से जुड़ा है।
यदि विकृत व्यवस्था तंत्र को समय रहते संबोधित नहीं किया गया,
तो न्याय का स्वरूप संतुलन से हटकर अनुमान आधारित हो सकता है—
जो किसी भी लोकतंत्र के लिए घातक है।
Prepared & Submitted by
डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज
स्वतंत्र शोधकर्ता (अन्तर्विषय अध्ययन)
भारत







कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें