(Judicial Reform & Due Process Safeguards)
समिति के लिए संक्षिप्त विवरण (Purpose of the Brief)
यह संक्षेप-नोट भारत की न्यायिक एवं विधिक व्यवस्था में उभर रही “विकृत व्यवस्था तंत्र (Distorted System of Governance)” की प्रवृत्ति, उससे उत्पन्न संवैधानिक असंतुलन, तथा आवश्यक न्यायिक एवं विधायी सुधारों पर माननीय संसदीय स्थायी समिति का ध्यान आकृष्ट करने हेतु प्रस्तुत किया गया है।
1. विषय-वस्तु का सार (Issue at a Glance)
वर्तमान विधिक परिदृश्य में यह देखा जा रहा है कि—
कुछ मामलों में आरोप को ही प्रारंभिक सत्य मान लिया जाता है,
प्रक्रिया-न्याय (Due Process) की भूमिका सीमित हो जाती है,
आरोपी को प्रभावी एवं समान प्रतिरक्षा का अवसर नहीं मिल पाता,
मिथ्या या दुर्भावनापूर्ण आरोप के लिए स्पष्ट दायित्व-प्रावधान अनुपस्थित हैं।
यह स्थिति न्याय को एकपक्षीय निर्णय की ओर ले जाती है।
2. संवैधानिक संदर्भ (Constitutional Context)
उक्त प्रवृत्ति निम्नलिखित संवैधानिक प्रावधानों को प्रभावित करती है—
अनुच्छेद 14 : विधि के समक्ष समानता
अनुच्छेद 21 : जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता
प्राकृतिक न्याय : निष्पक्ष सुनवाई एवं कारण-सम्मत निर्णय
3. समस्या का प्रभाव (Impact Assessment)
यदि वर्तमान प्रवृत्ति बनी रहती है, तो—
न्यायपालिका पर जन-विश्वास में कमी,
कानून के सामाजिक/राजनीतिक दुरुपयोग की संभावना,
निर्दोष नागरिकों के विरुद्ध मानसिक, सामाजिक एवं विधिक उत्पीड़न,
अपीलों एवं लंबित मामलों में वृद्धि।
4. तुलनात्मक अंतरराष्ट्रीय संकेत (Comparative Indicators)
अन्य लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में—
आरोपकर्ता एवं आरोपी—दोनों की प्रक्रियात्मक सुरक्षा,
मिथ्या आरोप हेतु उत्तरदायित्व निर्धारण,
प्रारंभिक स्तर पर न्यायिक परीक्षण (Judicial Screening)
को अनिवार्य माना जाता है।
5. नीति-समस्या का मूल (Core Policy Concern)
वर्तमान चुनौती Victim-Centric और Accused-Blind दृष्टिकोण से आगे बढ़कर
Justice-Centric, Balance-Oriented Framework विकसित करने की है।
6. समिति हेतु प्रमुख विचार-बिंदु (Key Questions for the Committee)
क्या वर्तमान विधिक ढाँचे में प्रक्रिया-न्याय पर्याप्त रूप से संरक्षित है?
क्या मिथ्या अथवा दुर्भावनापूर्ण आरोपों के लिए उत्तरदायित्व आवश्यक है?
क्या एकपक्षीय अंतरिम आदेशों के लिए अधिक कठोर मानक निर्धारित किए जाने चाहिए?
क्या प्रारंभिक न्यायिक समीक्षा को वैधानिक रूप से अनिवार्य किया जाना चाहिए?
7. समिति हेतु सुझाव (Suggested Course of Action)
माननीय समिति निम्नलिखित पर विचार कर सकती है—
Due Process Safeguards को सुदृढ़ करने हेतु विधायी संशोधन की संस्तुति।
मिथ्या आरोप के मामलों में उत्तरदायित्व एवं प्रतिकार तंत्र।
उच्च न्यायालयों के लिए मानक दिशानिर्देश तैयार करने की अनुशंसा।
न्यायिक प्रशिक्षण में प्रक्रिया-न्याय एवं संवैधानिक संतुलन पर विशेष बल।
8. अपेक्षित परिणाम (Expected Outcomes)
न्यायिक प्रक्रिया में संतुलन एवं पारदर्शिता,
निर्दोष नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की प्रभावी सुरक्षा,
न्यायपालिका में जन-विश्वास की पुनर्स्थापना,
विधि के दुरुपयोग में कमी।
9. संक्षिप्त निष्कर्ष (Concluding Note)
यह विषय केवल विधिक सुधार का नहीं, बल्कि संवैधानिक शासन की गुणवत्ता का प्रश्न है।
यदि समय रहते विकृत व्यवस्था तंत्र को संबोधित नहीं किया गया, तो लोकतांत्रिक न्याय-प्रणाली का संतुलन प्रभावित हो सकता है।
प्रस्तुतकर्ता
डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज
स्वतंत्र शोधकर्ता (अन्तर्विषय अध्ययन)
भारत
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