(Law Commission of India – Formal Memorandum)
भारत सरकार
विधि एवं न्याय मंत्रालय
विधि आयोग, भारत
विषय :
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में “विकृत व्यवस्था तंत्र (Distorted System of Governance)” के उभरते स्वरूप, उसके संवैधानिक प्रभावों तथा आवश्यक विधायी/नीतिगत सुधारों के संबंध में।
प्रस्तुतकर्ता :
डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज
सेवानिवृत्त प्राचार्य एवं व्याख्याता (मनोविज्ञान)
स्वतंत्र शोधकर्ता (अन्तर्विषय अध्ययन)
ग्राम : पचम्बा, जिला : बेगूसराय, बिहार (भारत)
दिनांक :
28 फ़रवरी 2026
1. संदर्भ (Reference)
यह ज्ञापन भारत के संवैधानिक लोकतंत्र में न्यायिक, प्रशासनिक एवं विधायी प्रक्रियाओं के अंतर्गत उभर रही एक गंभीर प्रवृत्ति—जिसे प्रस्तुतकर्ता द्वारा “विकृत व्यवस्था तंत्र” कहा गया है—के संदर्भ में माननीय विधि आयोग, भारत के संज्ञानार्थ प्रस्तुत किया जा रहा है।
2. पृष्ठभूमि (Background)
वर्तमान समय में यह देखा जा रहा है कि कुछ विधिक एवं प्रशासनिक व्यवस्थाओं में—
आरोप को ही सत्य मान लेने की प्रवृत्ति विकसित हो रही है,
प्रक्रिया-न्याय (Due Process) की भूमिका सीमित होती जा रही है,
तथाकथित पीड़ित पक्ष की जवाबदेही लगभग शून्य मानी जा रही है।
इससे न्याय का मूल सिद्धांत—सुनवाई, प्रमाण और संतुलन—प्रभावित हो रहा है।
3. समस्या का कथन (Statement of the Problem)
वर्तमान विधिक ढाँचे में यह प्रवृत्ति उभर रही है कि—
किसी व्यक्ति पर लगाए गए आरोप को बिना पर्याप्त साक्ष्य के अंतिम सत्य मान लिया जाता है,
आरोपी को प्रभावी प्रतिरक्षा (Defence) का अवसर सीमित या निष्प्रभावी हो जाता है,
आरोपकर्ता (तथाकथित पीड़ित) के लिए मिथ्या आरोप की स्थिति में कोई दंडात्मक उत्तरदायित्व निर्धारित नहीं है।
यह स्थिति न्याय को एकपक्षीय निर्णय में रूपांतरित कर देती है।
**4. विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण
(Legal and Constitutional Analysis)**
(क) संवैधानिक सिद्धांतों के संदर्भ में
यह प्रवृत्ति निम्नलिखित संवैधानिक मूल्यों से टकराती है—
अनुच्छेद 14 : विधि के समक्ष समानता
अनुच्छेद 21 : जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण
प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत : सुनवाई का अधिकार (Audi Alteram Partem)
(ख) विधिक सिद्धांतों के संदर्भ में
आरोप ≠ प्रमाण
प्रक्रिया-न्याय, परिणाम-न्याय से पूर्ववर्ती होता है
शक्ति का विवेकहीन प्रयोग विधि के दुरुपयोग को जन्म देता है
5. तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य (Comparative Perspective)
अन्य लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं (जैसे—यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोपीय संघ) में—
आरोपकर्ता और आरोपी—दोनों की प्रक्रिया-सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है,
मिथ्या आरोप के लिए दायित्व निर्धारित होता है,
न्यायालयीय परीक्षण (Judicial Scrutiny) को अनिवार्य माना जाता है।
6. व्यावहारिक प्रभाव (Practical Implications)
यदि विकृत व्यवस्था तंत्र को नियंत्रित नहीं किया गया, तो—
न्यायिक संस्थाओं पर जन-विश्वास क्षीण होगा,
कानून का राजनीतिक/सामाजिक दुरुपयोग बढ़ेगा,
निर्दोष नागरिक मानसिक, सामाजिक एवं विधिक उत्पीड़न के शिकार होंगे।
7. सुधार हेतु सुझाव (Recommendations)
Chairperson, Law Commission को संबोधित संस्करण,
माननीय विधि आयोग से विनम्रतापूर्वक निम्नलिखित सुधारों पर विचार करने का अनुरोध है—
आरोपकर्ता की प्रक्रियात्मक जवाबदेही सुनिश्चित करने हेतु स्पष्ट प्रावधान,
मिथ्या अथवा दुर्भावनापूर्ण आरोप की स्थिति में दंडात्मक उत्तरदायित्व,
किसी भी एकपक्षीय प्रशासनिक/न्यायिक निर्णय से पूर्व न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) को अनिवार्य बनाना।
**8. अपेक्षित विधायी/नीतिगत हस्तक्षेप
(Suggested Legislative / Policy Intervention)**
माननीय आयोग से यह प्रस्तावित किया जाता है कि—
प्रासंगिक अधिनियमों में संतुलनकारी संशोधन किए जाएँ,
Victim-Centric व्यवस्था को Justice-Centric व्यवस्था में रूपांतरित किया जाए,
प्रक्रिया-न्याय को सर्वोपरि रखने हेतु राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए जाएँ।
9. निष्कर्ष (Conclusion)
उपरोक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि यदि न्यायिक एवं प्रशासनिक व्यवस्थाओं में संतुलन स्थापित नहीं किया गया, तो लोकतांत्रिक शासन प्रणाली विकृत व्यवस्था तंत्र में परिवर्तित हो सकती है, जो संविधान की मूल आत्मा के विपरीत होगा।
10. प्रार्थना (Prayer)
अतः माननीय विधि आयोग, भारत से विनम्र निवेदन है कि—
इस ज्ञापन में उठाए गए विषयों पर गंभीरतापूर्वक विचार करें,
आवश्यक अध्ययन/परामर्श के पश्चात उपयुक्त विधायी एवं नीतिगत अनुशंसाएँ प्रदान करें।
11. हस्ताक्षर खंड (Signature Block)
सादर प्रस्तुत,
(हस्ताक्षर)
डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज
सेवानिवृत्त प्राचार्य एवं व्याख्याता (मनोविज्ञान)
स्वतंत्र शोधकर्ता (अन्तर्विषय अध्ययन)
ग्राम : पचम्बा, जिला : बेगूसराय, बिहार (भारत)
दिनांक : 28 फ़रवरी 2026
संलग्नक
संलग्नक–I : “विकृत व्यवस्था तंत्र” — वैचारिक प्रतिपादन
संलग्नक–II : तुलनात्मक संवैधानिक टिप्पणियाँ
🔒 स्थिति
यह ज्ञापन सीधे Law Commission of India / Ministry of Law & Justice को
प्रेषण हेतु पूर्णतः तैयार है।
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