विधि आयोग ज्ञापन
(Chairperson, Law Commission of India को संबोधित)
सेवा में,
माननीय अध्यक्ष महोदय/महोदया,
विधि आयोग, भारत
विधि एवं न्याय मंत्रालय
भारत सरकार, नई दिल्ली
विषय :
लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में “विकृत व्यवस्था तंत्र (Distorted System of Governance)” के उभरते स्वरूप, उससे उत्पन्न संवैधानिक एवं विधिक असंतुलन, तथा आवश्यक विधायी/नीतिगत सुधारों के संबंध में।
महोदय/महोदया,
सविनय निवेदन है कि यह ज्ञापन भारत के संवैधानिक लोकतंत्र में न्यायिक, प्रशासनिक एवं विधायी प्रक्रियाओं के अंतर्गत उभर रही एक गंभीर प्रवृत्ति—जिसे प्रस्तुतकर्ता द्वारा “विकृत व्यवस्था तंत्र” कहा गया है—के संदर्भ में माननीय विधि आयोग, भारत के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है।
1. संदर्भ (Reference)
यह ज्ञापन संविधान प्रदत्त न्याय, समानता एवं प्रक्रिया-न्याय के सिद्धांतों के आलोक में, वर्तमान विधिक एवं प्रशासनिक व्यवस्थाओं में उत्पन्न असंतुलन के संदर्भ में, माननीय विधि आयोग के संज्ञानार्थ सादर प्रस्तुत है।
2. पृष्ठभूमि (Background)
वर्तमान समय में यह देखा जा रहा है कि कुछ विधिक एवं प्रशासनिक व्यवस्थाओं में—
आरोप को ही अंतिम सत्य मान लेने की प्रवृत्ति विकसित हो रही है,
सुनवाई, साक्ष्य एवं प्रतिरक्षा (Defence) की भूमिका सीमित होती जा रही है,
तथाकथित पीड़ित पक्ष की प्रक्रिया-गत जवाबदेही लगभग शून्य मानी जा रही है।
इस प्रवृत्ति के कारण न्याय का मूल सिद्धांत—निष्पक्ष सुनवाई एवं संतुलन—प्रभावित हो रहा है।
3. समस्या का कथन (Statement of the Problem)
माननीय अध्यक्ष महोदय/महोदया,
वर्तमान विधिक ढाँचे में यह प्रवृत्ति उभर रही है कि—
आरोप और प्रमाण के मध्य आवश्यक भेद स्पष्ट नहीं रखा जा रहा है,
आरोपी को प्रभावी एवं समान अवसर प्रदान नहीं हो पा रहा है,
मिथ्या अथवा दुर्भावनापूर्ण आरोप की स्थिति में आरोपकर्ता के लिए कोई दायित्व निर्धारित नहीं है।
यह स्थिति न्याय को एकपक्षीय निर्णय में परिवर्तित कर देती है, जो लोकतांत्रिक शासन की आत्मा के प्रतिकूल है।
**4. विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण
(Legal and Constitutional Analysis)**
(क) संवैधानिक सिद्धांतों के संदर्भ में
उक्त प्रवृत्ति निम्नलिखित संवैधानिक मूल्यों से प्रत्यक्ष रूप से टकराती है—
अनुच्छेद 14 : विधि के समक्ष समानता,
अनुच्छेद 21 : जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण,
प्राकृतिक न्याय का सिद्धांत : निष्पक्ष सुनवाई (Audi Alteram Partem)।
(ख) विधिक सिद्धांतों के संदर्भ में
आरोप स्वयं में प्रमाण नहीं होता,
प्रक्रिया-न्याय, परिणाम-न्याय से पूर्ववर्ती होता है,
विवेकहीन शक्ति-प्रयोग विधि के दुरुपयोग को जन्म देता है।
5. तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य (Comparative Perspective)
माननीय अध्यक्ष महोदय/महोदया,
अन्य परिपक्व लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं—जैसे यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका एवं यूरोपीय संघ—में—
आरोपकर्ता एवं आरोपी—दोनों की प्रक्रिया-सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है,
मिथ्या आरोप की स्थिति में दायित्व तय किया जाता है,
न्यायालयीय परीक्षण एवं संतुलन को अनिवार्य माना जाता है।
6. व्यावहारिक प्रभाव (Practical Implications)
यदि विकृत व्यवस्था तंत्र को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया, तो—
न्यायिक संस्थाओं पर जन-विश्वास में क्षरण होगा,
कानून का सामाजिक एवं राजनीतिक दुरुपयोग बढ़ेगा,
निर्दोष नागरिक विधिक, मानसिक एवं सामाजिक उत्पीड़न के शिकार होंगे।
7. सुधार हेतु सुझाव (Recommendations)
माननीय अध्यक्ष महोदय/महोदया से सादर निवेदन है कि माननीय विधि आयोग निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार करे—
आरोपकर्ता की प्रक्रियात्मक जवाबदेही सुनिश्चित करने हेतु स्पष्ट विधिक प्रावधान,
मिथ्या अथवा दुर्भावनापूर्ण आरोप की स्थिति में दंडात्मक उत्तरदायित्व,
किसी भी एकपक्षीय प्रशासनिक अथवा न्यायिक निर्णय से पूर्व अनिवार्य न्यायिक समीक्षा।
**8. अपेक्षित विधायी/नीतिगत हस्तक्षेप
(Suggested Legislative / Policy Intervention)**
माननीय आयोग के समक्ष यह विनम्र प्रस्ताव रखा जाता है कि—
प्रासंगिक अधिनियमों में संतुलनकारी संशोधन किए जाएँ,
Victim-Centric दृष्टिकोण को Justice-Centric संतुलित दृष्टिकोण में रूपांतरित किया जाए,
प्रक्रिया-न्याय को सर्वोपरि मानते हुए राष्ट्रीय दिशानिर्देश विकसित किए जाएँ।
9. निष्कर्ष (Conclusion)
माननीय अध्यक्ष महोदय/महोदया,
उपरोक्त तथ्यों एवं विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि यदि न्यायिक एवं प्रशासनिक व्यवस्थाओं में संतुलन स्थापित नहीं किया गया, तो लोकतांत्रिक शासन प्रणाली विकृत व्यवस्था तंत्र में परिवर्तित हो सकती है, जो संविधान की मूल भावना के विपरीत होगा।
10. प्रार्थना (Prayer)
अतः माननीय अध्यक्ष महोदय/महोदया से विनम्र प्रार्थना है कि—
इस ज्ञापन में उल्लिखित विषयों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाए,
आवश्यक अध्ययन एवं परामर्श के पश्चात उपयुक्त विधायी एवं नीतिगत अनुशंसाएँ प्रदान की जाएँ।
11. हस्ताक्षर खंड (Signature Block)
सादर प्रस्तुत,
(हस्ताक्षर)
डॉ० प्रो० अवधेश कुमार शैलज
सेवानिवृत्त प्राचार्य एवं व्याख्याता (मनोविज्ञान)
स्वतंत्र शोधकर्ता (अन्तर्विषय अध्ययन)
ग्राम : पचम्बा, जिला : बेगूसराय, बिहार (भारत)
दिनांक : 28 फ़रवरी 2026
संलग्नक
संलग्नक–I : “विकृत व्यवस्था तंत्र” — सैद्धांतिक प्रतिपादन
संलग्नक–II : तुलनात्मक संवैधानिक टिप्पणियाँ
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